अनुवाद से अवसाद तक 

“..आपकी इस कहानी का तो अंग्रेजी भाषा में भी अनुवाद होना चाहिये ” साहित्य के नवांकुर ने अपने आदर्श रामजी लाल “ककहरा”  के पैर दबाते हुए उनकी कमजोर नस को दबा दिया  |  ख्यात साहित्यकार ककहरा जी को आंग्ल भाषा अत्यंत प्रिय थी लेकिन दिक्कत यह थी कि अंग्रेजी में उनका  हाथ तंग था |  उनकी बड़ी तमन्ना थी कि कभी उनकी कोई कहानी अंग्रेजी में अनुवाद हो कर छपे |

“हाँ ..पर हमको अंग्रेजी कहाँ आती है तुमको आती है  ..?”  ककहरा जी कुछ कुछ झूमते से बोले 
“..अ.. आती तो है पर इतनी नहीं , लेकिन ..” नवांकुर कुछ उत्साही स्वर में बोला  “..मेरे पड़ौस में एक अंग्रेजी का मास्टर रहता है, आप कहो तो उसे पटाऊं ..”  
“अनुवाद कर देगा वो ..?” ककहरा जी शंकित हुए
“कुछ गोली देनी पड़ेगी.. ” चेला कुटिल मुस्कान के साथ बोला | 
“उसे बोलो इस अनुवाद के अंग्रेजी साहित्य की पत्रिका में छपने पर उसका बड़ा नाम हो जाएगा ..स्साला नाम के लिये तो सब मरते है ..हीहीही ..” ककहरा जी ने दांव खेला  |
रामजी लाल “ककहरा” की उस कहानी के अंग्रेजी अनुवाद के लिए नवांकुर ने पड़ौस के मास्टर से बात कर ली और नियत समय पर अनुवाद होकर कहानी उनके  हाथों में पहुंच गई |  उन्होंने कहानी को पढ़ने के लिये ऑक्सफोर्ड का शब्दकोश भी खरीदा पर पांच पन्नों में पसरी उस कहानी के पहले पेज के मध्य तक आते आते ककहरा इतनी बार शब्दकोश खोल कर देख चुके थे कि शब्दकोश दस साल पुराना लगने लगा था | 
               आखिर ककहरा जी ने उस अनुवाद को पुनः अनुवाद कर जांचने की जिद छोड़ एज इट इज  ही अंग्रेजी साहित्य पत्रिका के वार्षिकांक हेतु  भेज देने का निर्णय लेते हुए पोस्ट कर दिया | 
               इस बात को लगभग एक महीना बीत गया था | उस गर्म दोपहरी को ककहरा जी अपने घर में अकेले बैठे अखबार  पढ़ रहे थे तब वो पहलवान सरीखा मास्टर उनके सिर पर सवार हो गया था | ककहरा जी ने उसे पहली  बार ही  देखा था | उसके भीम जैसे डीलडौल के कारण वो उसे देखकर भांप ही नहीं पाए कि यह वो अंग्रेजी अध्यापक है जिसने उनकी कहानी का अनुवाद किया था |  उसने बताया कि वो अनुवाद का पारिश्रमिक लेने के लिए आया था |  ककहरा जी विस्मित थे , क्योंकि ऐसा कोई रिवाज नहीं था | 
“..लेकिन पैसे की तो कोई बात नहीं हुई थी ना ..”
“अजी क्यों फिजूल बात करते हो काकड़ा जी ..”
“काकड़ा नहीं ककहरा ..” ककहरा जी ने यथासम्भव गम्भीर स्वर में टोका 
“अरे जो भी हो उस चेले को बुलाइये ..उस ने मेरे को बोला था दस पन्द्रह हजार तो मामूली बात है ..आप तो अनुवाद करो ..” 
“अरे समझते नहीं हो ..जब कहानी छपेगी तो अनुवादक के तौर पर तुम्हारा ही नाम होगा और मेरी सेटिंग बैठ गई तो तुम्हे अनुवाद का पुरस्कार भी दिला दूंगा जो कि बड़ी रकम का होता है ..” ककहरा जी ने उसके शरीर सौष्ठव को देखते हुए धीरज से समझाया | 
“एक महीना हो गया ..कब मिलेगा पुरस्कार ?”  पहलवान उतावला हो कर बोला  
“अरे बेवकूफ हो क्या ? छपेगी तभी तो आगे कुछ होगा ..”  कहते कहते ककहरा जी के अंतिम शब्द गले में ही घुट गए क्योंकि पहलवान के चेहरे पर बड़े क्रूर भाव आ गये थे  “बेटा ..तुम तो अंग्रेजी के अध्यापक हो ..विद्वान हो ..कुछ धीरज रखो ” ककहरा ने बात सम्हाली 
“कितना ?” 
“क्या कितना ?” 
“कितना धीरज रखूँ ? मुझे पुरस्कार उरस्कार से कोई मतलब नहीं है ..वो आप रख लेना  .. मुझे मेरा पेमेंट कब मिलेगा वो तारीख बताओ ..” 
“अरे फिर वही मूर्खता  ..”  इस बार ककहरा जी मात खा गये और बात सम्हालने से पहले पहलवान ने उनका गला सम्हाल लिया था |  ककहरा जी को वो साक्षात यमराज लग रहा था  |  पहलवान की विशाल हथेली में गला छुड़ाने के लिये ककहरा जी  ने दाँव खेला “दिसम्बर ..” 
“कितना ..?” 
“क्या कितना ..?” गला छुड़ाने की असफल छटपटाहट करते ककहरा जी जैसे फुसफुसाए
“कितना दिसम्बर ?” 
“31 दिसम्बर ..”  ककहरा को साल का आखिरी महीना सूझा था और उस महीने की अंतिम तारीख 
“एक जनवरी को तैयार रहना ..”  एक झटके से वो उनका गला छोड़ता हुआ बोला और सरपट निकल गया |  

                    ककहरा जी भौचक्का से  बैठे  रह गये  |  अपनी पैसठ साल की आयु में जिस गले में आज तक सम्मानजनक मालाएं ही पड़ती रही थी उस गले के किसी पहलवान के हाथों पकड़े जाने का उसे अभी भी भरोसा नहीं हो रहा था |  शुक्र था कि वो घर में आज अकेले थे नहीं तो बीवी बच्चों के सामने क्या इज्जत रह जाती |  वो सोच रहे थे कि मई का महीना चल रहा था और दिसम्बर तक का समय ले लिया था यानी सात महीने , तब तक तो उस अंग्रेजी पत्रिका का वार्षिकांक छपेगा  ही  छपेगा | अचानक उनको अपने चेले पर गुस्सा आ गया और उन्होंने उसे फोन लगा दिया | दूसरी तरफ से फोन उठते ही आवाज आई –
“गुरुजी प्रणाम ”
“प्रणाम गया तेल लेने , पहले ये बता कि तूने जिस आदमी से मेरी कहानी का अनुवाद करवाया है उसे क्या कह रखा है ?” 
“क्या कह रखा है ?” चेला कुछ सकपकाया 
“अबे वो सांड सरीखा आदमी अभी मेरे घर पर आया था ..कह रहा था कि तूने कह रखा है कि उस अनुवाद के लिये दस पन्द्रह हजार मामूली बात है ..” 
“गोली दी थी गुरुजी ..हीहीही ”
“अबे वो मेरा गला दबोच गया है ..अंग्रेजी का अध्यापक इतना देशी होता है क्या ? तुम्हें उसकी पहलवानी वाली बात पता नहीं थी ? इतने भयंकर आदमी को भला गोली दी जाती है ?  वो ..वो पैसे मांग रहा था ..” ककहरा जी कलप उठे थे |  
“उस वार्षिकांक का पता करो गुरुजी ..वहाँ से पैसे आएंगे तो पाप कट जाएंगे ..आप चिंता मत करो ” कहते हुए चेले ने फोन काट दिया |  
ककहरा जी ने गौर किया कि उनका शरीर हल्के हल्के कांप रहा था | कुछ देर वो यूँ ही बदहवास से बैठे रहे फिर कांपते हाथों से अपने उस सूत्र को फोन लगाया जिसने उसे अंग्रेजी साहित्यिक पत्रिका के वार्षिकांक के छपने की सूचना दी थी |  उस सूत्र से पता चला  कि वार्षिकांक कुछ तकनीकी कारणों से लेट हो गया है और अब नवम्बर में छपेगा |  ककहरा जी ने राहत की सांस ली क्योंकि अगर नवम्बर में भी छपता है तो पारिश्रमिक की राशि जो कि लगभग पांच हजार थी , पहलवान को मिल जाएगी और उसके अनुवाद की वाह वाही होगी सो अलग ..कुल मिला कर खतरा टल जाएगा आगे दांव पड़ा तो पुरस्कार भी दिला लाएंगे , समय तो इक्कतीस दिसम्बर तक ले ही रखा है |  

                पहलवान ने एक नई खब्त चालू कर रखी थी | वो अपने लँगोट धारण किये हुए फोटो उनके वाट्सएप पर नियमित भेजता था |  कभी दण्ड निकालते हुए कभी मुदगर घुमाते हुए | उन भयंकर तस्वीरों के प्रत्युत्तर में ककहरा जी सिर्फ इतना ही लिखते कि इक्कतीस दिसम्बर को आपके अनुवाद के पैसे मिल जाएंगे | इसके अलावा वो हफ्ते दस दिन से एक बार फोन कर इक्कतीस दिसम्बर का वादा याद करवाना नहीं भूलता था | 
                  अच्छा समय पंख लगा कर उड़ जाता है, सो ककहरा जी का भी उड़ गया और नवम्बर के महीने में उन्हें यह निराशाजनक  सूचना मिली कि उस वार्षिकांक का आइडिया ड्राप हो गया था | 
               ककहरा जी की कहानियों का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ था पर अनुवाद के लिए पैसे देने की बात से उन्हेँ वितृष्णा हो रही थी | आज तक लोग उनकी कहानियों के अन्य भाषा में अनुवाद के लिए चलाकर  अनुमति लेने आते रहे थे और कभी चवन्नी की भी लेनदेन नहीं हुई थी | अनुवाद के लिए मूल लेखक के अनुवादक को पैसे देने की बात उन्होंने कभी सुनी भी नहीं थी लेकिन उसकी आंखों के आगे उस सांड सरीखे अनुवादक का चेहरा आ गया ,  वो सांड इन सब साहित्यिक बातों को सुनने समझने वाला कहाँ था |

                   

                        वो उस क्षण को कोस रहे थे जब उन्होंने अंग्रेजी में अनुवाद के लिए चेले के कहने पर हाँ कर दी थी, फिर सोचा चेले का भी क्या दोष अंग्रेजी में अनुवाद की  उनकी भी  तो बड़ी तमन्ना थी |
                 इस बीच विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों में जाने पर मंच से उनकी आंखे श्रोताओं में उस पहलवान को ढूंढती रहती, पूरा ढूंढने के बाद उसे न पाने पर ही वो बोल पाते थे | किसी अनहोनी की आशंका से उनका कलेजा कांपता रहता था |  साहित्य के मकड़ध्वज जैसी हैसियत बनाने में उमर खप गई थी लेकिन पहलवान ने अगर सरेआम गला पकड़ लिया तो मिनटों में इज्जत उतर जानी थी |  
                     ककहरा जी की पत्नी ने  नोट किया कि उनकी डाइट कम हो गई थी और इसके कारण उनका वजन भी कम हो गया था | उसने यह चिंता अपनी उसी शहर में विवाहित बेटी से बांटी और वाया उसके यह चिंता जमाई बाबू तक जा पहुंची |  जमाई बाबू पेशे से  वकील था और स्वसुर जी को ‘छोटे पापाजी’ कहने वाला जिम्मेदार जमाई था | पच्चीस दिसम्बर के उस दिन जमाई बाबू मोटरसाइकिल पर पीछे अर्धांगिनी को लिये चिंताहरण के लिये ससुराल आ पहुंचा |  
“लेकिन आप क्यों चिंता करते हो छोटे पापाजी…मैं हूँ ना ..” जमाई बाबू ने दिलासा दी  “इस बार घर में घुसा तो एफ आई आर करवा के जेल में सड़ा दूंगा ..एक बात बताइये कि उसने अनुवाद किया वो तो ठीक ..लेकिन आप ने करवाया इसका क्या प्रूफ है उसके पास ..?
“मुझ से सहमति पत्र साइन करवा कर चेले ने दिया था ..” ककहरा जी मरे से स्वर में बोले |
“हाँ तो सहमति पत्र ही तो है, कोई आदेश पत्र या निवेदन पत्र थोड़े ही है ..आपने उसमें यही तो लिखा होगा न ..कि आप अपनी अमुक कहानी के अनुवाद की अनुमति या सहमति देते हैं ..?” जमाई बाबू ने कानूनी बात की जिसे सुनकर ककहरा जी के चेहरे पर रौनक आ गई |  अब ककहरा जी पूर्ण आत्मविश्वास से लबरेज थे |  
एक जनवरी को शुबह ककहरा जी कुछ लेट उठे क्योंकि रात को नए वर्ष की काव्य गोष्ठी में काफी देर से घर लौटे थे |  लगभग दस बजे होंगे जब वो मुँह में ब्रश दबाए अंगड़ाई लेते हुए घर की बॉलकोनी में आए |  घर के सामने दो तीन जने मिलकर तम्बू तानने वाला सरिया गाड़ रहे थे |  अचानक उन्होंने देखा कि पहलवान पांच सात लोगों के साथ आ रहा था | उनके छक्के छूट गए |  पहलवान ने सीधे आकर उनकी घर की कुंडी खटखटाई | ककहरा जी को जमाई बाबू का पढ़ाया पाठ याद हो आया |  वो तुरन्त दरवाजा खोलने को नीचे भागे
“देखो भाई ..वो वार्षिकांक तो हो गया रद्द ..” दरवाजे से ही भगा देने की मंशा में अड़े ककहरा जी की बात बीच में ही रह गई थी क्योंकि पहलवान भड़क उठा था 
“हमें कोई वार्षिकांक फारशीकांक से मतलब नहीं ..आज एक जनवरी है और आज का वादा किया था आपने..पइसा निकालो फटाफट..   ..” पहलवान अंगूठे को तर्जनी से भिड़ाता अधीर स्वर में बोला 
“देखो ..तुमने हमसे सहमति पत्र लिया था ..जिसका मतलब है कि तुम इच्छुक थे हमारी कहानी का अनुवाद करने के लिए .. हम ने तुम्हे अनुवाद के लिये कोई अर्जी नहीं दी थी जो पैसे दें ..”  ककहरा जी एक ही स्वांस में बोल गये | उन्होंने देखा कि उसकी बात सुनकर  पहलवान अपने साथ आए लोगों को पीछे घूम कर देख रहा था |  ककहरा जी के चेहरे पर विजेताओं वाले भाव आने लगे थे | 
“मैं नहीं कहता था कि ये टुच्चा है टुच्चा है टुच्चा है..तुम लोग मानते ही नहीं थे कहते थे बड़ा साहित्यकार है लेखक है  ..अब बोलो है कि नहीं ..?”  पहलवान अपने साथियों से संबोधित था और वो लोग ककहरा जी को हेय दृष्टि से देखते हुए सहमति में सिर हिला रहे थे | ककहरा जी पेशोपेश में थे | 
” तो भैया जी..” पहलवान ककहरा जी से पुनः सम्बोधित था “.. मुझे आपसे जैसी उम्मीद थी ..आप वैसे ही निकले ..अब ये सामने लगेगा तम्बू और आपके होगा बम्बू ..ये आपके चेले और आप से हुई फोन पर बातें सब रिकार्डेड है जो उस लाउडस्पीकर पर बजेगी ..वाट्सएप पर जो आपने बीसियों बार लिखा है कि इक्कतीस दिसम्बर को अनुवाद के पैसे मिल जाएंगे वो भी सोशल मीडिया पर जाएगा ..पैसे मत दीजिए ..मैं आपकी इज्जत ले लूंगा ..”   कहकर वो तम्बू की तरफ रवाना हो गया | ककहरा जी की घिघ्घी बन्ध गई, उन्हें अपनी इज्जत दुम दबाकर भागती नजर आ रही थी  | उन्होंने हाथो हाथ निर्णय लिया और  भाग कर पहलवान के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए  | बहुत मान-मनौव्वल करने पर पहलवान घर में आने को राजी हुआ | 
“दस हजार से एक पैसा कम नहीं लूंगा और ये तम्बू और माइक वाले को जो देना है वो भी आपको ही देना पड़ेगा ” 
“चलो दस हजार मान लिए..लेकिन ये तम्बू और माईक के ..ये तो आप ही दीजिये ना ..हीहीही ” ककहरा जी ने खींसे निपोरी 
“देखिए मैं फिजूलखर्ची में विश्वास नहीं करता.. सवेरे पांच बजे साइकिल लेकर सांगरी तोड़ने जाता हूँ  , गेहूँ पिसवाने को घर से  दस किलोमीटर दूर इसलिए साइकिल पर जाता हूँ क्योंकि वहाँ बीस पैसे किलो कम लगते हैं ..समझे ” 
“जी समझ गया ..” ककहरा जी ने मरे से स्वर में सहमति देदी | 
ककहरा जी की कहानी का अंग्रेजी में अनुवाद कभी किसी पत्रिका में छपा या नहीं यह तो ज्ञात नहीं लेकिन अंग्रेजी भाषा से उनका उनका पूर्ण मोहभंग हो गया था | 

Advertisements