अंतर्द्वंद

पहाड़ियों के बीच बसे उस छोटे से शहर के रेलवे स्टेशन पर वेटिंग रूम के रूप में बैठने की व्यवस्था वाले एक हॉल के अतिरिक्त एक डोरमेट्री भी बनी हुई थी | छोटे शहरों में सामान्यतया रेलवे रिटायरिंग रूम की सुविधा नहीं होती | उस पहाड़ी गन्तव्य तक जाने की सबसे आरामदायक परिवहन व्यवस्था रेल ही थी और यही व्यवस्था भारी बारिश और तूफान के चलते बीच रास्ते बाधित हो गई थी | उस स्टेशन पर तयशुदा दस मिनट के लिए रुकी ट्रेन वापिस रवाना नहीं हो पाई थी | बताया गया था कि आगे रेलवे ट्रेक पर चट्टाने गिर पड़ी थी भारी बारिश से इंजन फेल हो गया था सो अलग | ट्रेन के फर्स्ट क्लास में सफर कर रहे सिद्ध पीठ के महन्त अमितानन्द ने ए0सी0 बन्द होने पर घुटन से परेशान होकर अपने एक शिष्य को फोन लगाया था जो रेलवे के आला अधिकारी थे | उन्हीं के सहयात्री कुंदन महरोत्रा ने अपने पूंजीपति वर्चस्व का इस्तेमाल करते हुए मंत्रालय में फोन लगाया था | नतीजतन दस यात्रियों के लिए पर्याप्त डोरमेट्री में मात्र दो रसूखदार यात्री एक रात के लिये कब्जा किये हुए थे |

“हाँ.. हाँ सुधा तूफानी मौसम है पर मैं सेफ हूँ ..तुम परी और गुड्डु का ख्याल रखना .. हाँ मां से बात करवाओ ना .. हाँ मां बिल्कुल चिंता मत करो मैं बिल्कुल ठीक हूँ .. अरे गुड्डु और परी से दो बार बात कर चुका हूं माँ .. और देखो अब रात बहुत हो गई है तुम लोग चैन से सो जाओ ..” पिछले एक घण्टे में कुंदन के फोन पर कुल जमा उन्नीस फोन आ चुके थे और जिसमें यह तीसरी बार उसके घर से था | बाकी उसके स्टाफ , सहयोगियों और मित्रों के फोन थे | तूफान की खबर से सब चिंतित थे | कुंदन अंदर ही अंदर झल्ला रहा था | रात के दस बज चुके थे और फोन आने बन्द नहीं हो रहे थे | घर से दूर होने के कारण चिंतावश फोन स्विच ऑफ भी नहीं कर सकता था | उसकी नजर कुछ ही दूरी पर लगे बैड पर आसन लगाए बैठे महन्त जी पर पड़ी | वो सुखासन में शांतचित्त बैठे थे | एक हाथ में रुद्राक्ष की माला धीमे धीमे गति कर रही थी और चेहरा निश्चिन्तता और ओज से परिपूर्ण था | उसने अंदाज लगाया कि लगभग उसीके बराबर पचासेक साल की आयु रही होगी महन्त जी की | कितना शान्त जीवन जिया है ..और आगे भी जियेंगे .. एक वो था .. जन्मजात अशांत | बीस बरस पहले पिता के देहांत के बाद उनके कर्ज में डूबे व्यवसाय की विरासत को सम्हाला था और जैसे कर्ज के पाताल से निकल कर पूंजी के आकाश तक पहुंचने के इस बीस बरस में शायद ही कोई एक ऐसा पल रहा होगा जो उसने स्वयं के लिये जीया हो | कभी खानदान की इज्जत के लिये तो कभी पिता के नाम के लिए , कभी माँ का दिल रखने को तो कभी प्रतिद्वंदियों का दिल तोड़ने के लिये , शादी के बाद पत्नी की ख्वाहिशों के लिये जीया और अब तो जीने का मकसद थे परी और गुड्डु , उसके बच्चे | स्वयं की जिंदगी तो कभी एक पल के लिये भी जी ही नहीं थी और एक तरफ ये महन्त जी ..जीवन से भरपूर ..दुनियादारी से दूर आह प्रभु ने जीवन जीने को दिया और वो कभी जीया ही नहीं , यही अगर गृहस्थाश्रम है तो सन्यास क्या है ? बैड के सामने लगे पुराने जमाने के आदमकद शीशे में उसने खुद को देखा, चश्में की कमानियों के पीछे से कनपटियों के दोनों तरफ झलकती चांदी, बाहर को निकल रही तोंद और तभी याद आ गई बढ़ती बीपी और लिपिड प्रोफ़ाइल , रूखा और फीका भोजन, कम्पनी के लिये निरन्तर यात्राएं ..कुछ भी इच्छानुसार न कर पाने का दर्द ..यह शायद सन्यासी जीवन ही है जिसे गृहस्थ की खाल पहन कर वो घुट घुट कर जी रहा था ..उसे किसी मृत जानवर की खाल पहनने से होने वाली घुटन और छटपटाहट अनुभव होने लगी | उसने फिर से आंख भरकर महन्त जी की तनी हुई शांत मुद्रा को निहारा ..काश कि ऐसी शांति प्राप्त होती ..लेकिन इस जीवन में तो यह असम्भव ही था शायद ..वो एक आह सी भरते हुए करवट बदल कर सो गया |

महन्त अमितानन्द आंदोलित हो चुके थे | उन्होंने एक आंख खोल कर कनखियों से कुंदन को लेटते हुए देखा और देह को विश्राम दे दिया इतनी देर से नियंत्रित देह धनुष के झुकने से कमान के समान ढीली हो गई | वे वास्तव में कुंदन की फोन पर हुई प्रत्येक वार्ता को ध्यानपूर्वक सुन रहे थे | आज पहली बार जीवन निसार लग रहा था | किसी ने एक बार भी फोन कर सुध नहीं ली थी और लेता भी कौन ? बरसों पहले बैराग आने पर बिलखती हुई मां के रोकने पर वो नहीं रुके थे ..आंखों के सामने वो दृश्य घूम गया जब अपने ही हाथों अपना श्राद्ध किया था .. स्वामी जी ने तब उसकी माँ और दोनों छोटे भाइयों के सामने कहा था कि समझ लो तुम लोगों ने इसे खो दिया है | क्या वास्तव में उसे तब बैराग ही आया था या कि पिता की असामयिक मृत्यु से ज्येष्ठ पुत्र के रूप में आए असहाय परिवार के प्रति उत्तरदायित्व से भय उत्पन्न हो गया था ? क्या गृहस्थाश्रम अधिक चुनौती पूर्ण नहीं हो गया था ? उन दो छोटे शिशुओं को कैसे पाला होगा उस अनपढ़ माता ने ? …नहीं नहीं .. बैराग ही था ..उससे इतना कठोर तप नहीं तो कैसे हो पाता भला ..आज इंद्रजीत था वो तो तपस्या के कारण ..किसी भय से वशीभूत कोई इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं कर सकता ..| उसने सप्रयास करवट बदली | क्या प्राप्त हुआ इतने कठोर तप से.. मोह से मुक्त हो गया था | इतना मुक्त कि अपने सगे भाइयों को आज सामने खड़ा देख ले तो पहचान भी नहीं सकता ..लेकिन यह अगर गुण है तो पशुओं में तो जन्मजात ही होता है ..तो क्या वो वास्तव में पशुता की तरफ अग्रसर है ? नहीं नहीं पशु हिंसक होते हैं , कामुक होते हैं और स्वार्थवशीभूत होते हैं ..उसका जीवन तो अध्यात्म के लिए है समाज के लिये है | जब वो महन्त बना तब उस प्राचीन मठ की सम्पूर्ण सम्पति की दुकानें तब दुकानदारों ने कब्जे कर रखी थी , उसी ने कोर्ट कचहरी में वकीलों की फौज खड़ी करके समस्त सम्पति खाली करवाई थी जिनका आज लाखो रुपये भाड़ा आ रहा था जो कि समाज सेवा में व्यय होता है , उसने तो आज तक एक नए पैसे का व्यय स्वयं के लिये नहीं किया .. उसके चेहरे पर कुछ गर्व के भाव आ गए थे | लेकिन अगले ही पल विचार आया कि यदि यही कोर्ट कचहरी , यही हिसाब किताब करने थे तो गृहस्थाश्रम भला क्या बुरा था ? अपने स्वयं के परिवार का पोषण करने में असमर्थ कोई व्यक्ति समाज के पोषण की बात करे तो क्या यह ढोंग नहीं ? कैसी खाल थी यह सन्यास की जिसमें छुपकर उसे सभी सांसारिक कृत्य करने पड़ रहे थे ..हा ! घुटन और उमस से भरा कृत्रिम जीवन .. महन्त जी की आंखे भारी हो चली थी | निद्रामैया ने धीमे से उन्हें अपनी गोद में ले लिया |

यह असन्तोष शायद जीवन की परिवर्तनशीलता का मूल है या कि गति का .. सृष्ट चक्रवातों से नवसृजन करती है ..वैचारिक चक्रवात शायद सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं ..

Advertisements