मेरी आँखें चुंधिया सी रही थी | शीशे के उस तरफ किसी ने बल्ब जला दिया था |
बरसों से अंधेरे में रहते रहते मेरी अंधेरे में रहने की आदत पड़ गई थी | दीवार पर रहने वाली छिपकलियां अब मुझे एक जैसी नहीं लगती थी उनकी शक्लें पहचानने लगी थी मैं | कौन किस की बेटी किसकी पोती सब पहचानती थी उस धुप्प अंधेरे में | मेरे ऊपर चढ़ आती पर मैं बुरा नहीं मानती क्योंकि मुझे भी अब उनसे लगाव हो गया था | बरसों पहले का वो दृश्य हमेशा याद करती रहती थी जब कस्बे में फैली महामारी के कारण मेरा बेटा बहू कस्बा छोड़ कर व्यापार के लिये परदेस को निकले थे , बेटा और बहू नन्हे से बाबू को लेकर जाते वक्त मेरे सामने हाथ जोड़ कर खड़े हुए थे , बेटे ने कहा था कि परदेस में जब खुद का घर ले लूंगा तब तुम्हें लेकर जाऊंगा माँ, आशीर्वाद बनाए रखना | मुझे भी लगा कि मेरा वंश भी प्रगति करना चाहिये और भीगे मन से विदा किया था | तब से आज तक यहाँ कोई आया ही नहीं लेकिन मुझे उम्मीद थी कि एक दिन मेरा बेटा मुझे जरूर लेने आएगा और उस परदेस के घर जाऊंगी |
मुझे तो आज भी याद है जब मेरे श्वसुर जी ने इस जमीन पर पचास साला कब्जा सिद्ध करके दरबार से पट्टा बनवाया था और हवेली बनवाई थी | उनका नाम था गोविंद लाल जी ..ये बड़ी बड़ी मूंछें रखते थे ..लेकिन मूंछों के पीछे से झांकती वो निर्मल मुस्कुराहट मैं आज भी नहीं भूलती ..कहते थे कि बींदणी की छम छम से बनियों की यह हवेली स्वर्ग सी लगती है , मैं भी तो पूरे दिन हवेली में विचरती फिरती थी जब तक कि बिरजू पेट में नहीं पड़ा था | और वो ..? वो थे एक दम मस्त मौला ..बस चौपड़ का शौक था उनको ..शाम पड़े जब दुकान से आते तो दानखाने में दो चार दोस्तों के साथ चौपड़ की महफ़िल लगती और मैं भिजवाती कभी शर्बत कभी छाछ ..काजू चबीणी और भुजिया | मुझे कहते कि मैं उनकी जिंदगी में खुशबू का झौंका बन कर आई हूँ | और मेरी सासु मां, उनका अलग ही रौब था | उनके साथ बग्गी में बैठकर जब मदनमोहन जी के मंदिर में जाती थी तो लगता था बादलों में उड़ रही हूँ | माखन मिश्री का भोग लगा कर वो प्रसाद मुझे देती थी जिसे मैं सब लोगों को बांटती | मेरी छमछम पर उनकी कठोर आंख रहती पर मेरा सबसे ज्यादा ख़याल भी वो ही करती | श्वसुर जी जब माताजी की तस्वीर बनवाने के लिये उस तस्वीर बनाने वाले कलाकार को घर लाए थे तो माताजी ने कहा कि बींदणी की तस्वीर बनवाइये , और तीन दिन लगे थे तस्वीर बनने में |
“यह कमरा कुछ ठीक है ..सोफे भी बैठने लायक है यहीं बैठते हैं ..” कपड़े से सोफे की धूल झड़काते हुए उस प्रौढ़ आदमी ने बाकी तीन लोगों को इशारा किया | दो जने तो शायद उसके कर्मचारी थे वो तुरन्त बैठ गए एक कुछ गुस्सैल सा रोबदार युवक था उसने नाक भौ सिकोड़े तो उस प्रौढ़ ने सामने के एक दिवान पर बिछी चादर हटा दी जिसके नीचे साफ सुथरा गद्दा बिछा था | मेरी नज़र उस युवक पर टिक गई , मैं उस युवक को पहचानने की कोशिश कर रही थी क्योंकि उसकी शक्ल कुछ कुछ मेरे श्वसुर गोविंदलाल जी से मिलती थी | मैं समझ गई वो जरूर मेरा पोता बाबू था |
“देखिये मिस्टर लाल ! ये दस्तावेज हैं आपकी इस हवेली के ..इसका पट्टा बना है गोविंदलाल जी के नाम से और उसके बाद उनके एक मात्र पुत्र बिहारीलाल उनके वारिश हुए | बिहारलाल जी से यह विरासत बिरजलाल , बाबूलाल , हरिलाल , देवीलाल , श्रीलाल से होकर आपके पिता शंकरलाल को मिली ..” वो प्रौढ़ कह रहा था और मेरे कान सुन्न हो रहे थे, जिंदा होती तो आंख में जरूर आंसू आगये होते ..कितनी पीढियां गुजर गई थी ..यह लड़का मेरा क्या हुआ ? पड़पोता ? नहीं..यह मेरे पड़पोते के भी पड़पोते का बेटा था ..सदिया बीत गई थी मुझे इन छिपकलियों के बीच अपने बेटे बहू का इंतज़ार करते , और वो तो कभी के स्वर्ग सिधारे
“..आप होटल से कल सीधे रजिस्ट्रार ऑफिस आ जाइएगा ..” उस प्रौढ़ ने पटाक्षेप करते हुए कहा “..चेक और केश वहीं लेनदेन हो जाएगा ..फर्नीचर वगैरह कुछ उपयोगी है नहीं यहाँ.. फिर भी आप कुछ निकलवाना चाहे तो खरीददार को कोई आपत्ति नहीं ..”
“कुछ नहीं निकलवाना ..” उस युवक ने उसे बीच में ही टोक दिया
“यह ..?” वो प्रौढ़ ऊपर मेरी ही तरफ देख रहा था
“यह क्या ..?” युवक कुछ झुंझलाया
“यह तस्वीर तो शायद आपके पुरखों में से किसी औरत की लगती है ..” वो प्रौढ़ किसी कुर्सी पर चढ़ कर ऊंचा हाथ कर मेरे चेहरे के आगे के शीशे पर से धूल हटाता हुआ बोला
“अरे छोड़ो यार वकील साब ..हमारे पुरखे रँगीले राजा रहे होंगे ..पता नहीं किस बाजारू औरत की तस्वीर लगा रखी है ..आप इसे यहीं छोड़िये और चलिये यहां से ..” वो दनदनाता हुआ निकल गया | जिंदा होती तो शायद खून कर देती उसका | हवेली बेच रहा था और मुझे बाजारू बता गया था कम्बख़्त |
हवेली बिक गई और उसमें होटल खुल गया | मुझे टांगा गया था खाने पीने के कमरे में | लोग मेरे सामने दारू मांस मिट्टी सब खाते पीते और मैं बस सूनी सी आंखों से मदनमोहन जी के भजन कक्ष में यह सब देखती | देखना मजबूरी होती है मेरी क्योंकि मैं न तो आंखें बंद कर सकती हूँ और न ही आंसू आते हैं कि आंखे ही धुंधला जाए |
बरसों बरस बीत गए |
एक दिन हवेली में तस्वीरों की प्रदर्शनी लगी थी |
“यह तस्वीर वहाँ एक्ज़िबिट में क्यों नहीं ..?” कॉफी पीती वो युवती मुझे एक टक घूर रही थी
“जी यह बिक्री के लिये नहीं है ..” बैरे ने जवाब दिया
“..इसकी आंखों में क्या बला की उदासी है ..मुस्कुराते चेहरे पर ये उदास आंखे ..किस की पेंटिंग है यह ..?”
“जी यह तो इस हवेली की ही पेंटिंग है..” बैरे ने ससम्मान जवाब दिया
“सो नाइस ..अपने मालिक को बुलाओ ” वो मुझे अभी भी लगातार घूर रही थी | काफी देर हुज्जत के बाद उस ने मुझे ऊंचे दामों पर खरीद लिया और अपने बंगले में ले आई | तब मुझे नहीं पता था कि मैं अपने ही वंश में लौट रही हूं |
“ये तुम्हारे ग्रैंडपा की पिक कितनी ओल्ड हो गई है डार्लिंग ..” वो उस विशाल कमरे में लगे सोफासेट पर बैठे युवक से सम्बोधित थी
“पर तुम इसे हटा कर जो तस्वीर लगाना चाहती हो वो तो ओल्ड से भी ओल्ड है ..” हंसते हुए सिगरेट का कश खींच कर उस युवक ने किताब पर से नज़र हटाते हुए उसे देखा
“उसे ऐंटीक कहते हैं ..” उसने त्योरियाँ खींचते हुए उस नौकर को इशारा किया जो मुझे हाथों में थामे खड़ा था |
अगले कुछ ही मिनट में मैं उस विशाल कक्ष की दीवार पर अकेली काबीज थी और उसके दादा की तस्वीर जमीन पर पड़ी थी …मैंने शीशे के पार गौर से उस तस्वीर को देखा यह तो वही कम्बख़्त था जो मुझे बाजारू कह गया था |
✍️ Avinash Vyas