राहत 

अधखुली आंखों से उसे दीनू की बदहवास सूरत नजर आ रही थी .. उसका काला चेहरा तमतमा रहा था और आंखें एकटक सामने तनी हुई  थी |  किसी कांच के नाजुक सामान की तरह उसे बांहों में उठाए वो एक एक कदम दृढ़ता से गली के बाहर की तरफ उठा रहा था जहाँ कि एम्बुलेंस आने वाली थी | लेकिन उसकी आंखों ने तो जैसे एक आदत पाल ली थी दीनू के अक्स को देखते ही क्रोध करने की .. दिल में एक हूक सी उठती थी अपने बदसूरत अनपढ़ पुत्र को देखकर .. उसे नफरत थी उसकी शक्ल से … इतनी मेहनत की थी उसने और उसकी  पत्नी राधा ने उसे पढ़ाने की .. दोनों की बड़ी भारी इच्छा थी कि दीनू मेट्रिक भी करले तो कहीं से कह सुन के उसकी शादी कर देंगे  |  इकलौता पुत्र जो शादी के पन्द्रह बरस बाद ऊपर वाले ने दिया  वो भी सूरत से चांडाल सा.. ऊपर से मूर्ख इतना कि एक अक्षर नहीं पढ़ पाया था .. बस खाना और दण्ड पेलना .. सवा छह  फीट का दानव सा हो गया था बीस बरस की उम्र में  पच्चीस का  दिखता  था  |  उसने जैसे उसकी विशाल बांहों में ही करवट सी ली .. राधा फोन पर बात करते हुए चल रही थी ..अपने भाइयों को बुला रही थी शायद .. उसकी अधखुली नज़र गली के नुक्कड़ वाले मकान की बॉलकोनी में खड़ी मिसेज कपूर पर पड़ी .. अपने पुत्र डॉक्टर अमन कपूर के कारण कितनी गर्व में रहती थी वो .. आज उसके चेहरे पर हीन भावना सी क्यों नज़र आ रही है ? ओह पिछले साल कपूर साहब का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था तो उनकी याद आ रही होगी .. लेकिन उस दिन एक घटना और हुई थी ..उनका डॉक्टर पुत्र विदेश में रहता था उसने फोन पर ही कह दिया था कि वो आ नहीं पायेगा .. तब रिश्तेदारों ने ही कपूर साहब का अंतिम संस्कार किया था ..  लेकिन वो तो मिट्टी थी मिट्टी में मिल गई और क्या .. लग रहा था कि एम्बुलेंस अभी आई नहीं थी .. दीनू अपनी भुजाओं में उसे सम्हाले सड़क किनारे पड़े एक पत्थर पर अपना एक पैर जमा कर खड़ा था .. शर्मा जी का लड़का मनोज आया था शायद .. उसने सप्रयास आंखे खोली ..हाँ वही था ..सुंदर मुखड़े वाला और पेशे से इंजीनियर ..लव मैरिज की थी और चांद सी बहू लाया था .. शर्मा जी की बीवी की अपनी बहू से नहीं बनी होगी इसीलिये आजकल अलग मकान में रहता है  .. वो दीनू को समझाने आया था कि सड़क किनारे चद्दर बिछा कर लिटा देते हैं गोद में लिए कब तक खड़े रहोगे ..  उसे हलका सा झटका लगा उसने फिर अधखुली आंखों से देखा कि उज्जड दीनू ने शायद उसे लात मार दी थी क्योंकि वो अब सड़क पर घबराया सा पड़ा था  .. दीनू के चेहरे पर दृढ़ क्रोध था .. वो उसे एक टक देख रहा था  ..आज पहली बार दीनू की उज्ज्डता पर उसे क्रोध नहीं आया था |   अचानक दीनू के चेहरे से टपकती पसीने की एक बूंद उसकी खुली हथेली पर आ गिरी जो शायद उसे अंदर तक भिगो गई  …पुत्र के प्रति आज उसे पहली बार प्यार का अनुभव हुआ था .. उसकी आँखों से आंसू बह निकले थे .. शायद आज उसने दीनू को पितृ ऋण से मुक्त कर दिया था  |  एम्बुलेंस आ चुकी थी लेकिन अब तो  उसके दिल के दर्द में राहत  भी आ चुकी थी |