अपराध बोध 

“बेटा नवीन !  चरण वन्दन करो.. ”  सेठ मूलचन्द जी इस बार कुछ कठोर स्वर में बोले |  
उनका पोता उनके साथ आज पहली बार यहाँ आया था और जब से स्वामीजी के कक्ष में आया था तबसे कक्ष की एक एक वस्तु को निहार रहा था , कभी वहाँ बिछे महंगे कालीन को तो कभी कक्ष के शानदार सोफासेट को, कभी वहाँ बिछे शानदार डबल बेड को तो कभी छत से लटकते विदेश से आयातित फानुश को, कभी वो दीवारों को देखता जिस पर अत्यंत कुशलता से भित्तिचित्र बनाए गए थे तो कभी उस ए0सी0 को जिसने कमरे को वातानुकूलित कर रखा था |   सेठ जी उसके व्यवहार से असहज हो रहे थे उन्होंने दूसरी बार नवीन को चरण वन्दन करने को कहा था पर उसका ध्यान कहीं और था | 
“हा हा हा ..आपका पोता कौतुहल में है मूलचन्द जी यह आंखे चौड़ी कर कर के सम्पूर्ण कक्ष को निहार रहा है ”  फिर वो बालक को सम्बोधित हुए  “..लेकिन बेटा तुम इतने  आश्चर्यचकित क्यों हो ? यह सब चीजें जो तुम निहार रहे हो वो तुम्हारे घर में भी है बल्कि इससे भी बेहतर …जिन्हें तुम प्रतिदिन देखते हो ..” 
“लेकिन स्वामी जी ,  दादा तो कहते हैं कि आप तो साधु हो ..” नवीन हैरान स्वर में बोल पड़ा | 
दस बरस के नवीन की बात सुन कर स्वामीजी  और सेठ मूलचन्द जी दोनों  के चेहरों पर अपराध बोध आ गया था  लेकिन दोनो के कारण जुदा थे |
सेठ जी अपने पोते के कारण स्वामीजी के प्रति अपराध बोध में थे जबकि सदा गुरुगम्भीर रहने वाले स्वामीजी  बालक से  हंसकर बात  कर  लेने के कारण |  
बालक नवीन की जिज्ञासा अभी भी वही थी , अनुत्तरित …