● देस री माटी ● 

राजस्थानी भाषा  

रात री बी बेळा में हरित शर्मा  आपरे घर रे डागळे एकलो ऊभो हो |  बो अर बिरी जोड़ायत शीला काल ई शिकागो सूं आपरे कस्बे में पूग्या हा |  दोनुं सॉफ्टवेयर इंजीनियर रे रूप में लारले दस बरसां सुं अमेरिका में काम कर रया था |   लाखों डॉलर अर कामयाबी रे बावजूद भी हरित ने  सदेई लागतो के बो अमेरिका में एक इसे दरखत आळीकार है जिके री जड्यां बीरे छोटे से सेर में ई रेयगी  |  बो बठे खुद ने बिना जड्यां रो कटियोड़ो पेड़ जियां महशूस करतो जिके में कोई पत्ती लाग सके ना फळ  बस  ईमारती लकड़ी रूप में काम आय सके जकी दिखत में घणी फूटरी हुवे पर  बी मे जी ना हुवे | 

पिछले दो बरस सुं तो बिरो जी घुटण लागग्यो हो |  बिये आपरी आ घुटण कदैई शीला सुं सांझी कोनी करी |  बीने डर हो के इसूं शीला कठैई  रीस ना करले |  बिरो सुरुआत सुं  विदेश जाणे रो सुपणो  हो अर बठे आ र बीरी नजर में बा बोत खुश भी थी | दोनुं बच्चा भी चोखी तालीम लेय रिया था असे में आ केवणी के सब छोड़ छाड़ र देस चालो,  शायद शीला ने भोत भुंडो लागतो |  बो बीने हर हाल में राजी देखणों चावतो हो अर इये कारण आपरी घुटण आप रे जी में ई राखियोङी राखी |  

                    दो महीना पीछे एक दिन शीला ऑफिस सुं आंवती विदेशी पौधां  री एक दुकान सुं कैक्टस रे नाम पर बिक रेयो ग्वारपाठे रो पौधो ले आई अर बो पौधो  फ़्लैट री बालकनी में बाकी बठे रे पौधों साथे लगा दियो | पण  थोड़ा ई दिनां में गवारपाठो गळणो शुरू हुयग्यो |  

“ओ ग्वारपाठो देख्यो हरित ..खाद पाणी सब देते देते बी गळग्यो .. ई रो कईं कारण ?”   शीला पलँग पर  सूती सूती बीने पुच्छ्यो 

“ई रो देस छूटग्यो बावळी ..” हरित रे मुंडे सुं लेपटॉप पर काम करते करते बेख्याली में निकळग्यो 

“तो आपां रो भी तो छुटग्यो ..?” शीला उठ र बैठी हुयगी ही |  हरित बेरे खानी सामो जोयो तो देख्यो बी री आंख्यां में पाणी भरियोड़ो हो |  बिये लैपटॉप  बन्द करियो अर बीरे खने आ र बैठग्यो 

“कांई केणो चावे है शीला ?”  

“म्हारी जिद सुं ई अठे आया ..ई कारण म्है थांने के नई पाई ..अबे म्हारो अबे अठे जी कोनी लागे ..” बा फूट फूट र रोवण लाग गी ही   “म्हारी एक गलती री सजा किती और भुगतनी पड़सी ..” बा रोवते रोवते बोली 

“तो आपां हिंदुस्तान चाल ज्यासाँ ..पण टाबरियां री पढ़ाई लिखाई ..आपां रो रुजगार ..?” 

“आपां किसा अठे पढ़िया लिखिया हा ..टाबर  इण्डिया में पढ़ लेसी ..आपां दोनुं ने बठे घणी नौकरियां मिल जासी ..जैपर जोधपुर नई तो हैदराबाद , गुड़गांव ,दिल्ली मुम्बई ..घणी जगायां है ..म्हने अबे थे देस ले जाओ .म्हें भी इये ग्वारपाठे जियां माय री माय गळ रयी हूँ ..”  शीला रोवते रोवते हरित रो हाथ काठो झाल लियो थो |  

दूसरे ई दिन सुं दोनु जीणा  इण्डिया री नौकरी जोवण लाग्या अर जैपर में बे चावता जसी नौकरी मिलगी |  रूपया तो आधा ई को हा नी पर संतोष हो के घर रे खने पुग जासां  |  

“हरित ..” बो चौक र पीछे मुड़यो |  शीला खड़ी थी |  लाल सुर्ख साड़ी पेरयोड़ी अर देसी गेणागांठा  सुं लकदक 

“माँ जी बुलावे ..चालो जीम लो…”  बा चहचहाई 

बीरे मुंडे पर हरख देख र हरित ने लाग्यो आई तो बा शीला है जिके रे बो साथे पढयो लिखियो ..जिके सुं बी रा बयांव हुया ..आ ख़ुशी बी रे चेहरे पर बिये बरसों बाद देखी ..शायद देस री माटी मिलते ई पौधे जड्यां लेणी शुरू कर दी थी  |