शायद कभी ..कहीं ..

“देखो रमा तुम्हारा यह नाटक बहुत हो गया , मैं अब और बर्दास्त नहीं कर पाऊंगा ..” क्रुद्ध होकर पल्लव सोफे से उठ खड़ा हुआ था | उसकी  वृद्ध माँ  सम्भावित कलह की आशंका से भयभीत होकर कुर्सी पर बैठी बैठी माला और तेज घुमाने लगी थी, चश्मे के मोटे कांच से उसकी आंखें कुछ और बड़ी दिखने लगी थी | 

” दो ही तो पीरियड लेती हुँ मैं कॉलेज में और यह मैं अपनी खुशी के लिये करती हुँ और पैसे भी तो आते हैं .. लेकिन पल्लव  मैं तुम्हारी , मांजी और बच्चों की जरूरतों का भी तो पूरा ख्याल रखती हूँ ..घर में मेरी जिम्मेदारियों को पूरा करने में कोई कमी आई है क्या बताओ ? …”   कहते  कहते  रमा कि  आंखें  भर  आईं  थी |  
“नहीं जरूरत है तुम्हारे पांच सात हजार की ..कभी तुम्हे पैसे की कमी आई है क्या ?..जितने मांगे उतने दिए फिर भी ये सब नाटक क्यों ..? लोग क्या कहेंगे ..यही ना.. कि सेठ दीनदयाल के मरते ही उसकी बहू भटकने लगी है ..” कहते हुए उसने हाथ में पकड़ी पानी की गिलास फर्श पर दे मारी  | माहौल तनाव पूर्ण हो चुका था | 
“बेटा.. तुम्हारे पापा के रहते मैं क.. कभी नहीं बोल पाई अब वो नहीं तो त..तुमने उनकी ज..जगह ले ली .. ” कुछ अटकती हुई सी वृद्ध मां बोल पड़ी 
“तुम कुछ नहीं बोलती मां इसी का तो यह नतीजा है, वरना मजाल है कि सास की इच्छा के बगैर बहु सांस भी ले सके ..” पल्लव मां पर भड़का 
“किसने कहा कि सास अपनी बहू की सांस रोक देने के लिये ही होती है ?..” मां कुछ आवेश में आ गई थी “..तुम्हारी दादी ने मेरा जीना हराम कर दिया था ..हवेली से बाहर झांकने तक के लिये उनसे पूछना पड़ता था ..  पायल भी खोल कर नहीं रख सकती थी क्योंकि उसकी छम छम से भी वो मेरी हवेली के अंदर की चहलकदमी पर नजर रखती थी ..क्या गुनाह था मेरा ?  किसी जेल के कैदी सा जीवन मुझे किस गुनाह में मिला था ? गले और हाथ पांव में पड़े भारी सोने के जेवर कैदियों की जंजीरों से लगते थे  ..और यही सब तुम अपनी पढ़ी लिखी  पत्नी के लिये चाहते हो ? लेकिन कान खोल कर सुनलो .. मैं वैसी सास नहीं ..और बहू तुम्हे कोई सफाई देने की जरूरत नहीं तुम यहाँ गुलाम नहीं हो .. ”  वृद्धा मां आवेश की अधिकता से हांफने लगी थी |  रमा ने तुरंत पानी की गिलास उसके हाथ में दी और पीठ पर हाथ फिराने लगी | 
“पापा हमें भी तो स्कूल में रिसेस और गेम पीरियड मिलता है और  अपनी मोहनी बाई भी तो छुट्टी लेती है …तो मम्मी को क्यों नहीं जबकि इनका तो कोई सन्डे भी नहीं होता  ?” बारह बरस की पूजा अपने छोटे भाई के कंधे पर हाथ रखे  कमरे के दूसरे कोने से बोल पड़ी थी |  
दोनो बच्चों की प्रश्नसूचक  आंखें  पल्लव पर गड़ी थी |  पानी पीते हुए मां की क्रुद्ध आंखे चश्में के अंदर से पल्लव पर टिकी थी और रमा अपनी सास की पीठ पर हाथ फिराते हुए पल्लव को उम्मीद भरी नजरों से  देख रही थी |  
पल्लव की आंखे बेचैन सी  घूम रही थी , उसने सप्रयास थूक निगला और  सूख आए होंठों पर जुबान फिराई  | पल्लव ज्यादा देर इतनी नजरों का सामना न कर सका और उसने चुपचाप नीचे झुक कर फैंका हुआ पानी का गिलास उठा लिया |  उसने शायद आज हथियार डाल दिये थे | 
            शायद ..गहरी जड़ें जमाई हुई पुरानी सोच के फोडों की शल्य चिकित्सा कर मवाद निकालने के लिए तीनों पीढ़ियों का एकजुट होना जरूरी है |

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