सरप्राइज 

रात के दस बज चुके थे | पूरी कोठी को दुल्हन की तरह सजाया गया था लेकिन प्रकाश व्यवस्था बन्द की हुई थी | सेठ हजारी लाल के आठ वर्ष के पोते मयंक का जन्मदिन था | मयंक अपनी मम्मी और डैडी के साथ घूमने शिमला गया हुआ था और आज लौटने वाला था |  सेठ जी ने उसके लिए सरप्राइज बर्थ डे पार्टी रखी थी | मयंक और उसके मम्मी डैडी पहुंचने के सात बजे के अनुमानित समय से लेट  हुए जा रहे थे | कोठी की लॉबी में मन्द सी रोशनी और मद्धम संगीत के साथ मेहमानों में खाने पीने का दौर चल रहा था |  
                 उस गहमा गहमी से कुछ दूर कोठी की लॉबी के पार बने भव्य मंदिर में पंडित लीलाधर अपने आठ बरस के पोते सोहन के साथ आयुषवृद्धि यज्ञ सम्पन्न करवा चुके थे किंतु सेठ जी की आज्ञा से मयंक को आशीर्वाद देकर उसके हाथ से ही दक्षिणा प्राप्त करनी थी अतः उसके इंतजार में बैठे माला जप रहे थे किन्तु पण्डित लीलाधर जी अत्यंत बेचैन थे | माला फेरते हुए उनकी दृष्टि बार बार दीवार पर लगी घड़ी की तरफ जा  रही थी | सोहन उत्सुकता से बार बार लॉबी की  तरफ  के  दरवाजे  से  झांक  कर  आ रहा था  | पण्डिताई के काम में बंद मुठी दक्षिणा का ही रिवाज होता है जो कि जल्दबाजी करने पर यजमान के अप्रशन्न हो जाने पर कम हो सकती थी इसलिये पण्डित जी ने धीरज धार रखा था | 
               अचानक बाहर से कुछ कोलाहल की आवाजें आनी शुरू हो गई  शायद सेठ जी का पोता आ चुका था |  पण्डित जी ने तुरंत अपनी माला और आसन समेट कर थैले में डाले , पहले से तैयार दीपक कुमकुम की थाली लेकर पोते का हाथ पकड़े लॉबी की तरफ लपक पड़े |  कोठी की सारी लाइट्स चालू कर दी गई थी |  धीमी गति से बजता संगीत अचानक तीव्र गति से बजने लगा था | सेठ जी का पोता अपने माता पिता के साथ अचकचाया सा खड़ा था जबकि सेवकों ने ऊपर बॉलकोनी से पुष्पवर्षा शुरू कर दी थी | सारे मेहमान एक सुर में हैप्पी बर्थ डे टू मयंक  गा  रहे थे |   पण्डित जी अपने सहमे हुए से पोते का हाथ पकड़े एक हाथ में कुमकुम की थाली लिये सप्रयास मयंक तक पहुंचे और मंत्रोचार के साथ आरती उतार कर तिलक किया |  सेठ जी की आज्ञा से मयंक ने पंडित जी के चरणस्पर्श किये और उनके दिए कुछ रुपये पण्डित जी को थमा दिए |  
                 दक्षिणा प्राप्ति के बाद सेठ जी के भोजन के आग्रह को टालते हुए टिफिन में खाना लेकर  पण्डित लीलाधर जी तीव्र गति से पोते के  साथ  निकल पड़े |  उनके पोते सोहन की भी आज बरसगांठ  थी |  सवेरे ही उसके हाथ से शिव मंदिर में दूध चढ़वा दिया था लेकिन पण्डिताइन ने और उन्होंने कल रात ही तय किया था कि यदि सेठ हजारीलाल के यहां से पर्याप्त दक्षिणा मिली तो सोहन को कपड़े वाले फैशनेबल जूते दिलाएंगे जिसकी की पिछले कई महीनों से वो जिद कर रहा था | वो सोहन का हाथ थामे सड़क पर उड़े जा रहे थे क्योंकि बाजार बंद होने का समय हो रहा था |
               रात के ग्यारह बजे थे | सोए हुए सोहन को बाहों में थामे पण्डित जी सड़क किनारे एक बैंच पर शांत बैठे हाथ में पकड़े तुड़े मुड़े नोटों को नम आंखों से देख रहे थे | पण्डित जी ने सब जगह घूम कर देख लिया था |  दक्षिणा की राशि से सोहन के पसंदीदा जूते आने सम्भव नहीं थे | वो सोहन को सरप्राइज नहीं दे पाए थे | आज पहली बार वो पण्डिताइन का सामना करने से कतरा रहे थे |

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