बावळी 

“सुनो जी आपको विशाल कैसा लड़का लगा ?” भागीरथ की पत्नी मोहनी ने चलती ट्रेन में पति से पूछा | वे भागीरथ के पिता का ऑपरेशन करवा कर सपरिवार शहर से गाँव लौट रहे थे | 
“बहुत परोपकारी है ..समाजसेवी है..बाउजी के ऑपरेशन के चलते बीस दिन तक शहर के अस्पताल में रहे, पर उसने सबकुछ सम्हाल लिया.. हम तो  गाँव से रवाना होते समय बहुत परेशान थे क्या होगा..कैसे होगा ..पर वाह ..सब की सेवा वो भी बिना एक पैसे लालच के ..हमें गर्व है गाँव के इस गबरू पर यह जरूर गाँव का नाम रोशन करेगा ”  भागीरथ सिंह  सीना चौड़ा करता  हुआ  बोला | 
“तो अपनी सुमन की बात चलाएं ?” 
“बावळी हुई है क्या ?” भागीरथ तैश में आ गया था  “कमाई धनाई कुछ नहीं और दिन दिन भर फिरता रहता है मरीजों की सेवा में ..इसका बाप हरिसिंह जब तक सरकारी नौकरी में है तबतक यह नाटक चलने वाला है फिर रोटियों के भी लाले पड़ने है देखना  .. खबरदार दोबारा इस तरह की बात की तो ..सुमन के लिये तो कोई सरकारी नौकर  ढूंढेंगे ” 
कम पढ़ीलिखी मोहनी समझ नहीं पाई कि पिछले दिनों  सरकारी अस्पताल के सरकारी कर्मचारियों को पीठ पीछे गाली देता उसका पति दामाद रूप में सरकारी कर्मचारी क्यों चाहता है जबकि तारीफ हमेशा विशाल की करता था |

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