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उसने कुर्सी के नीचे अंधेरे में हाथ से टटोला..कुछ नरम और मोटी सी चौकोर वस्तु ..पर्स ? 
उसने फौरन उसे उठा लिया | 
पर्स ही था |  
अत्यंत हृष्टपुष्ट मर्दाना पर्स ,  लेकिन सिनेमा हॉल के उस अंधेरे में नोट सही से नजर नहीं आ रहे थे |   उस लगभग खाली पड़े सिनेमा हॉल में उसकी पंक्ति में नजदीकतम दर्शक भी उससे पांच सीट दूर बैठा था लेकिन मोबाइल टोर्च की रोशनी में पर्स देखने की उसकी  कवायद पर उसकी दृष्टि पड़नी लाजिमी थी | खतरा लेने की बजाय उसने पर्स चुपचाप अपनी जेब के हवाले कर लिया |   
लेकिन नोट देखने की बेसब्री से उससे रहा नहीं जा रहा था | इतने मोटे पर्स में कितने रुपये हो सकते हैं ? पचास नोट  ? और यही पचास नोट अगर दो दो हजार वाले हुए तो ?  एक लाख रुपया |  उसका दिमाग तेज गति से चल रहा था |  अभी सिनेमा हॉल से रवाना हो जाए ?   अगर पर्स का मालिक लौटा भी तो किसी को क्या पता लगेगा कि इस सीट पर कौन बैठा था  जो पर्स ले गया |  लेकिन इस लगभग खाली सिनेमा हॉल में उसका बीच सिनेमा से निकलना सभी को याद रहेगा, गेटमैन, आइसक्रीम वाला जो अभी उसे बाहर मिलने वाले थे , हॉल के कॉरिडोर और एंट्री एक्जिट पर सी सी टीवी कैमरे भी हो सकते हैं  |  पुलिस कैमरे की फुटेज के आधार पर उस तक  आसानी से पहुंच जाएगी |   उसने जेब से रुमाल निकाल कर चेहरे पर चमचमा उठी पसीने की बूंदे पोंछी कुछ गला भी सूखता सा लगा |  
फिर उसने आगे सोचा कि पुलिस अगर उस तक पहुंच भी जाए तो इस बात का उनके पास क्या प्रमाण होगा कि पर्स उसने ही उठाया था बल्कि यह भी सिद्ध करना मुश्किल होगा कि उस पर्स के मालिक ने पर्स सिनेमा हॉल में ही खोया था |  
बढ़िया |  
लेकिन पुलिस की पूछताछ में क्या वो टिका रह पाएगा ? लगभग एक घण्टे में फ़िल्म समाप्त हो जाएगी तब सब के साथ आराम से निकले तो किसी को शक भी नहीं होगा |  लेकिन इसमें एक समस्या थी कि अगर पर्स का मालिक फ़िल्म का शो समाप्त होने से पहले आ गया तो इसी चेयर के नीचे ही अपना पर्स ढूंढेगा जहां पर की उसने बैठ कर फ़िल्म देखी थी  |  उसकी तलाशी हो गई तो पर्स बरामद हो जाएगा |  तो उस सीट को बदल कर खाली पड़ी किसी दूसरी सीट पर बैठ जाए ?  नहीं नहीं कुल जमा बीस पच्चीस लोगों में उसका सीट बदल कर बैठना कोई छिपने वाली बात नहीं होगी, पकड़ा जाएगा |  उसका चेहरा पसीने से भीग रहा था और गला सूख रहा था | 
 उससे और सस्पेंस बर्दास्त नहीं हुआ और वो उठ कर हॉल से बाहर निकलकर जेंट्स टॉयलेट में घुस गया |  मारे प्यास के बुरी स्थिति हो रही थी और टॉयलेट से पहले ठंडे पानी की मशीन भी लगी हुई थी जिसकी उपेक्षा करता वो आगे बढ़ गया था | शायद प्राथमिकताएं परिस्थितियां ही तय करती है | टॉयलेट में घुसते ही जेब से उसने पर्स निकाला और तुरन्त अंदर झांका |  उसके चेहरे पर गहरी निराशा छा गई |  पूरा पर्स कागजों से ठूंसा हुआ था |  कागजों के अलावा कुल जमा दो सौ रुपये और कुछ चिल्लर | उसने महसूस किया किया कि उसकी दिल की धड़कन सामान्य हो चली थी |   उसने जैसे राहत की स्वांस ली |   बाहर  निकल कर ठंडा पानी पिया |  
“मैनेजर साहब ये पर्स सम्हालो ..सीट नम्बर डी-151 के नीचे पड़ा मिला है ..कोई ढूंढता हुआ  आये तो दे देना .. आपको मेरी इस ईमानदारी की अखबार  में न्यूज देनी चाहिये ..आपके सिनेमा हॉल की रेपुटेशन भी बढ़ेगी यह मेरा फोटो रख लो …और मेरा नाम है ………”

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