बदला 

“यह मदन यहां क्यों घूम रहा है ..? ” सड़क दुर्घटना में घायल अपने किशोर पुत्र के सिरहाने बैठे रधुवीर जोशी ने कुछ आवेश में अपनी पत्नी से पूछा 

“पता नहीं ..” उसकी पत्नी शीला ने भावहीन स्वर में  जवाब दिया 

“यह कानिया घटिया आदमी है ..” 

“हूं..” 

“काना खोड़ा काबरा सिर से गंजा होय , इन सब से बात करे तो हाथ में डंडा होय ..”  नफरत झलक पड़ी 

“इसकी आंख बचपन में आपने ही फोड़ी थी ..” 

“खेल खेल में ..जानबूझ कर नहीं ..” 

“इसके मां-बाउजी ने क्षमा कर दिया था आपको ..” 

“क्षमा ..माई फुट ..कोई किसी को क्षमा नहीं करता और यह बदला लेकर रहेगा .. मैं इससे सावधान हूँ ..” 

“आपकी कल्पना में भी नहीं है कि कोई किसी को इस तरह क्षमा कर सकता है ..इसीलिए आप इससे भयभीत रहते हैं..बदला लेना होता तो आज तीस बरस हो गए इस घटना को..कब का ले चुका होता ..” 

“इसे मौका ही कहाँ मिला ..और मैं किसी से भयभीत होने वाला नहीं हूँ ..और तुम इस बात को भूल जाओ कि वो तुम्हारा मौसेरा भाई है ..किसी दिन यही भाई तुम्हे विधवा भी बना देगा ..मौका मिला तो” 

” कल इसे मौका मिल गया था और इसने बदला ले भी  लिया ..” 

“क.. क्या मतलब ..?” 

“कल गुल्लू के ऑपरेशन के समय तीन यूनिट खून की जरूरत थी ..एक एक यूनिट हमने दिया था ..तीसरा यूनिट खून यही दे गया था …” 

“क्या ..? यह क्या कह रही हो ..” वो हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ था “जरूर उसे कोई भयंकर बीमारी होगी इसीलिए उसने हमारे गुल्लू को खून दिया है …अरे बेवकूफ औरत मुझे तो बताना था ..मैं डॉक्टर से पूछ कर आता हूँ ” वो लगभग रोता हुआ सा वार्ड से बाहर को भागा | 

● 

इस घटना को लगभग दो बरस बीत गए थे | 

रघुवीर और मदन के परिवार एक साथ घूमने शिमला आए हुए थे |  दोनों बचपन के मित्रों में अब कोई शिकायत नहीं थी |  प्रेम इतना ज्यादा हो गया था मानो तीस बरस के अबोले की क्षतिपूर्ति हो रही हो |  

“मदन भैया .. आखिर आपने कौनसी जादू की छड़ी घुमाई जो ये इतना बदल गए ..?”  शीला और मदन होटल के गार्डन में बैठे थे | 

“बदला ले लिया ..” 

“बदला ? कब ? कैसे ? ” 

“तुम्हे याद है साल भर पहले एक्सीडेंट में रघु की टांग टूट गई थी और मैं अस्पताल ले गया था ..?” 

“हाँ ..तभी से तो यह प्रेम उमड़ा है ..” 

” देखो शीला ..बचपन मे मेरी आँख रघु की गलती से फूट गई थी ..इसके मन पर उस बात का गहरा सदमा लगा था ..इसे उस समय कोई सजा मिल गई होती तो इसके दिल से बोझ हलका हो गया होता , लेकिन इसे कोई सजा नहीं मिली और अपराध बोध एक सनक की तरह इस के मन पर हावी होता गया ..यह मुझसे आशंकित रहने लगा कि मैं जरूर कभी बदला लूंगा ..इसका यह अपराध बोध भय में तब्दील होकर कब नफरत में बदल गया पता ही नहीं चला ..” मदन चाय पीने को रुका 

“फिर ..?” 

“मैंने काफी सोच विचार कर इसके दिमाग के दृष्टिकोण से सोचा और मुझे लगा कि अगर मैं कुछ ऐसा करूँ जिससे इसे यह लगे कि मैंने बदला ले लिया है तो शायद इसके मन का बोझ हलका हो जाएगा, और मैने बदला ले लिया ..” 

“क.. कैसे ..?”  

“इसका कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ था शीला ..मैंने ही इसे सूनी सड़क देख कर रोका था.. पहले लातो और घूंसों से दबाकर धोया फिर हॉकी स्टिक से एक टांग तोड़ दी थी ..”

“यह क्या कह रहे हो ..” शीला आक्रोश में आ गई थी 

“न न बहना गुस्सा मत करो इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था और मै भी इस से खुश नहीं ..पर अंत भला तो सब भला ..उस दिन यह मेरे सामने गिड़गिड़ाने लगा था कि अब तो बदला पूरा हो गया है उसे छोड़ दूं ..तब मैंने झूठ ही कहा कि हाँ अब बदला पूरा हो गया . फिर इसे अस्पताल लेकर गया .जहां यह मेरे गले लग कर रोया था ..और हमने मिलकर एक्सीडेंट वाली कहानी घड़ी थी | ” 

“आपने मवाद से भरे फोड़े को चीरा लगा दिया ..” शीला विस्मित थी | 

मानव मन की ग्रंथियां अत्यंत दुरूह है |

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s