हमदर्द

“टिक टिक टिक…” 
                     जून के महीने में लू चालू हो गई थी और सड़कें सूनी पड़ी थी |   गर्म दोपहर की उस नीरवता में घड़ी की आवाज स्पष्ट सुनाई पड़  रही थी |  

                      सड़क किनारे उस कैंटीन में चाय पीने रुके  दवा कम्पनी के एमआर  सुनील वर्मा की नज़र उस घड़ी पर ठहर गई |  सबसे छोटी वाली सैकण्ड की सुई में उसे स्वयं का अस्तित्व दिख रहा था |  सैकण्ड की सुई के साठ चक्कर होने पर मिनट की सुई एक चक्कर पूरा करती है और तीन हजार छः सौ चक्कर पूरे  करने  पर घण्टे  वाली  सुई  एक  चक्कर  |  

                    सैकण्ड की सुई लगातार  दौड़ती जा रही थी जैसे वो खुद दौड़े जा रहा था दवाइयों की बिक्री के लिये |  मिनट और घण्टे की सुइयां क्रमोत्तर मोटी और निठल्ली थी ,  सैकण्ड की सुई पर पूर्ण आधारित उसके एरिया मैनेजर और डीजीएम की तरह। |  लेकिन शायद  यह नियति थी जिसको बदलना सम्भव नहीं था | 

                        सुनील पिछले पांच बरस से उस मेडिकल कम्पनी का मुलाजिम  था | कम्पनी के  सेल्स टारगेट  पूरा करने को वो जी जान से लगा रहता लेकिन हमेशा कुछ पिछड़ ही जाता | 

                         साप्ताहिक टारगेट में पिछड़ता तो सोचता अगले हफ्ते ज्यादा करके मासिक सुधार लेगा , मासिक में पिछड़ता तो सोचता एनुअल टारगेट पर ध्यान  देगा और कवर कर लेगा |  लेकिन टारगेट कभी पूरे होते ही न थे | टारगेट पूर्ण न होने पर अधिकारियों द्वारा  जलील  किया  जाता था | कभी इंक्रीमेंट रोकने की धमकी तो कभी  टर्मिनेशन की तलवार |  नौकरी करते रहने के अतिरिक्त कोई विकल्प उसके पास न था, लेकिन अपनी उस जिंदगी से वो काफी निराश हो चुका था |  टाई की नॉट ढीली करते हुए  उसने पुनः घड़ी की तरफ देखकर आह सी भरी.. उसे इस बात से सख्त एतराज हो रहा था कि घड़ी में सेकंड से छोटी कोई मेक्रो या नैनो सेकंड की सुई क्यों नहीं थी | अचानक बाहर अत्यन्त अभद्र गालीयों के साथ किसी को डांटने की  आवाज  आई  |  

                उसने पीछे गर्दन घूमा कर देखा एक महिला  गोद में एक मरियल से बच्चे को लिये खड़ी कुछ मांग रही थी |  चाय वाला गाली देते हुए मसाले कूटने वाली  मूसल दिखाते हुए मारने की धमकी देता  हुआ उसे  भगा रहा  था |  वो निरन्तर मांगे जा रही थी और दुकानदार की गालियाँ भी प्रचण्ड रूप धारण कर रही थी | उस भयँकर गर्मी मे वह तपती सड़क पर नँगे पाँव खड़ी थी | सुनील से देखा न गया और वो तुरन्त उठ कर चाय वाले के करीब पहुंचा  ” ये क्या बकवास कर रहा है बे ?  महिला से बात नहीं करनी आती क्या ?”  दुकानदार उसकी बात से हंस पड़ा ” क्या बाबू ..ये काहे की महिला सहीला है.. दो कौड़ी की भिखारन है ..” उसने खींसे निपोरी | 

“शटअप ..” सुनील आवेश में आ गया उसने ने तुरंत एक बिस्किट का पैकेट लिया और साथ में दस का नोट थमाते हुए उस भिखारन को रवाना किया |  दुकानदार  मुंह छुपा कर हंस रहा था | उसे सुनील की नादानी पर हंसी आ रही थी,  उसे क्या पता था कि सुनील उस भिखारन में कोई मेक्रो या नैनो सेकन्ड की सुई तलाश रहा था |

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