● फर्जीवाड़ा ● 

वो गर्मियों का एक सामान्य सा दिन था |

प्रकाश माथुर ब्लॉक प्रारम्भिक शैक्षणिक प्रभारी था |  प्रतिदिन की तरह वो अपने कमरे में बैठ कर फाइलें निपटा रहा था |  तभी एक ग्रामीण अपनी दस ग्यारह वर्ष की बेटी के साथ उपस्थित हुआ |  वो अपनी बेटी का दाखिला अपने गांव में चल रहे सरकारी बालिका आवासीय विद्यालय में करवाना चाहता था किंतु वहां पर उसको प्रवेश देने से मना कर दिया गया था, यह आवासीय विद्यालय उसके ही अधीन था , इसलिये फरियाद लेकर वो बाप बेटी जिला मुख्यालय में लगने वाले उसके कार्यालय में आये थे | 

“बाप जी म्हारी छोरी भोत हुशियार है, पढ़णी चावे अर म्हें भी पढ़ाणा चाउं,  पर बे केवे के जिकी नई पढ़णी चावे बीने ढूंढ र लेस्यां ..थारी छोरी ने कोणी लेवां ..बे केवे ओ कायदों है ..ओ  कठे रो कायदों ..बे केवे थारी छोरी ने शहर रे हॉस्टल में पढ़ा ले ..हूँ मजूर आदमी इत्तो खरचो कठे उं लाउँ ?” 

                            समस्या विचित्र थी |  उसकी बेटी ने पांचवी कक्षा अधिकतम अंकों से उत्तीर्ण की थी और उसके गांव में आगे छठी कक्षा के लिए सरकारी विद्यालय भी था लेकिन उसमें वह अपनी  बेटी का दाखिला नहीं करवाना चाहता था क्योंकि उस  ग्रामीण ने  बताया कि वो  मजदूरी के लिये कई कई दिन घर से दूर रहता था कुछ दिन पहले उसकी पत्नी चल बसी थी और अब बिन माँ की बच्ची को घर पर अकेला नहीं छोड़ सकता था इसलिए  वो आवासीय विद्यालय में दाखिला चाहता था |  सरकारी बालिका आवासीय विद्यालय में बेहतर पढ़ाई के साथ साथ रहने खाने और कपड़े तक की  सरकारी मुफ्त व्यवस्था थी वो भी पूरी सुरक्षा  व्यवस्था के साथ |  समस्या यह थी कि आवासीय विद्यालयों में सरकार “ड्राप आउट” अर्थात वे बालिकाएं जिन्होंने किन्ही कारणों से विद्यालय में पढ़ाई बीच में ही छोड़ थी , उनको प्राथमिकता से प्रवेश देती थी | 

                      उस वर्ष विशेष अभियान के तहत सरकारी निर्देश थे कि मात्र ड्राप आउट का ही प्रवेश लेना है | चूंकि उस ग्रामीण की बेटी पांचवी कक्षा उत्तीर्ण थी इसलिये उसका प्रवेश नियमानुसार नहीं हो सकता था | उसका प्रवेश तब भी हो जाता अगर उसके गांव के आस पास दस किलोमीटर में कोई पांचवी कक्षा से आगे का सरकारी विद्यालय न होता, लेकिन उसके तो गांव में ही सरकारी विद्यालय था |

                       सरकार की मात्र यह मंशा थी कि जो लोग गरीबी या अन्य कारणों से बेटियों को स्कुल नहीं भेज सकते उनको प्रोत्साहन  दिया जाय लेकिन सरकारी ढांचे में नियमों की शब्दशः पालना ही की जा सकती है | प्रकाश माथुर व्यक्तिगत रूप से सहमत था कि उसका प्रवेश हो लेकिन कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था |  

                      उसने अपने बाबू हरीश पांडिया को तलब किया | उसे सारी समस्या बताई गई | पांडिया ने कुछ देर विचार किया फिर उस ग्रामीण का झोला लेकर टेबल पर उलट दिया | उसमें से उसने पहली कक्षा से पांचवी तक की अंकतालिकाएं क्रम से रखी ..तीसरी तक का विद्यालय अलग था और चौथी पांचवी का अलग ..पूछने पर ग्रामीण ने बताया कि पहले वो किसी अन्य गांव में मजदूरी करता था जहाँ तीसरी कक्षा तक बच्ची को पढ़ाया था फिर जब वर्तमान गांव में आ गया था तो टीसी कटवा कर इस गांव के विद्यालय में दाखिला करवा लिया था |  पांडिया को रास्ता सूझ गया था | 
“देख बाबा गौर से सुन ले , तेरी बेटी का आवासीय विद्यालय में  प्रवेश का एक तरीका है ..” 
“कईं साहब जी ..?” 
“तेरे गांव का ड्राप आउट बच्चों का सर्वे कल से शुरू होगा..उनको अपनी बच्ची का नाम ड्राप आउट के रूप में लिखा देना .. इसकी चौथी और पांचवी की अंकतालिकाएं फाड़ कर फैंक देना और फिर आवासीय विद्यालय में जाकर एक हलफनामा लिखकर देना कि तेरी घरेलू स्थिति खराब होने के कारण तूने तीसरी कक्षा के बाद इसे स्कूल से निकलवा लिया था, यह तीसरी कक्षा उत्तीर्ण की अंकतालिका साथ में ले जाना और लिखना कि चौथी और पांचवी की पढ़ाई गत दो वर्षों में घर पर ही करवाई गई है ..यह भी लिख देना कि यह ड्राप आउट बच्ची है इसलिये इसका प्राथमिकता से छठी कक्षा में प्रवेश लिया जाय |” कहते हुए दाद मांगती निगाह से उसने अपने अधिकारी की  तरफ देखा |  प्रकाश माथुर जो एक निहायत ही ईमानदार अधिकारी था आज  नेक काम के लिए अपने बाबू हरीश पांडिया की  “फर्जीवाड़े” की इस सलाह पर मुदित हो ही रहा था कि  अचानक जैसे उसे अपना दर्प टूट कर बिखरता सा लगा..
“नहीं साहब ,  मुझे नहीं चाहिये एडमिशन … चालो बापू  ..”  बालिका आंदोलित होकर अपने बापू का हाथ पकड़ कर उससे कह रही थी “मैं गांव री स्कूल में ई चली जाऊं ..थे मजूरी करण जाओ जद एकली घर मा रे लेउँ चिंता मति करो.. हूँ अब छोटी कोनी मने रोटी बणाणी भी आगी अब तो ….चालो..” 
“अरे बिटिया क्या हुआ ..? करवाते हैं ना तुम्हारा एडमिशन ..” पांडिया कुछ सकपकाता सा बोला
“नहीं साहब ..झूठ बोलना पाप है ,  माँ कहती थी झूठ बोलने से कुछ नहीं मिलता  ..मुझे झूठ बोल कर विद्या कैसे मिलेगी ..मैं गांव की स्कूल  में ही पढूँगी . ?” कहती हुई वो नमस्ते करती हुई अपने पिता को खींच कर ले गई थी |  प्रकाश और पांडिया स्तब्ध से बैठे रह गए थे | 

              प्रकाश माथुर ने अनुभव किया कि काफी देर से पैर लटका कर बैठने से पैर कुछ सुन्न सा हो रहा था वो जुराब खिसका कर चिकोटी  काटता हुआ सोच रहा था कि आज उसकी सुन्न होती चेतना पर भी उस बच्ची ने चिकोटी भर दी थी |

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