● प्रेमकहानी ●

“मुझे डॉ राजेश से प्रेम हो गया है ..”  घोषणा करती सी दमयंती अपनी सहेली और सहकर्मी शीला वर्मा से सम्बोधित थी |       

                     डॉ राजेश कपूर और दमयंती खुराना कुछ साल पहले उस अस्पताल में नियुक्त हुए थे | डॉ राजेश  श्वसन रोग विशेषज्ञ था वहीं दमयंती नर्स थी, जिसे डॉ राजेश के विभाग में ही नियुक्त किया गया था |  डॉ राजेश विकलांग था | बचपन में पोलियो की मार ने एक पैर खराब कर दिया था, किंतु बावजूद इसके उसका व्यक्तित्व अत्यन्त सुदर्शन था |  दमयंती उसे लोगों का ईलाज करते देख अत्यन्त प्रभावित होती थी |  वो उसे एक पैर में बांधे जाने वाले सपोर्टर और जूते पहनने में कई बार मदद करने आगे बढ़ती तो वो हाथ के इशारे से मना कर दिया करता था |  डॉ राजेश अत्यन्त मितभाषी था | दमयंती से उसका संवाद आँखों की भाषा में ही हुआ था |  जाने उसने क्या कहा था और  दमयंती ने क्या सुना था |  

“तूँ पागल हुई है दमयंती !  अरे वो तो विकलांग है ..अपने आप को तो सम्हाल नहीं सकता तुझे क्या खाक सहारा देगा ..”  शीला इस घोषणा से विचलित सी होकर बोली 

“सहारा तो मैं बनूँगी ..जीवन भर के लिये ..” 

“यह तेरी दया है उसके लिये ..प्रेम नहीं .”

“वो दया का पात्र नहीं है शीला ..बहुत स्वाभिमानी है,  जब भी मैं कुछ मदद करने की कोशिश करती हूँ ..उसके चेहरे पर नाराज़गी सी आ जाती है .. ” 

“वो भी तुम्हारे बारे में ऐसे सोचता है ..आई मीन प..प्रेम करता है ?” 

“हाँ ..” 

“उसने कभी कहा ?” 

“नहीं ..लेकिन उसकी आँखे सब कह जाती है, मुस्कुराहट के सितार के साथ  प्रेमगीत गुनगुनाती सी..”  दमयंती शून्य में ताकती मंत्रमुग्ध सी कह रही थी  |

            दमयंती का डॉ राजेश से विवाह हुए पांच साल हो गए थे |  राजेश की माँ तीन साल पहले पोते पोती का मूँह देखने की आस लिए गुजर गई थी जिसके छः माह बाद प्रीति पैदा हुई थी | बच्ची को सम्हालने के साथ घर का और बाहर का  कामकाज करने में इतना समय व्यतीत हो जाता था क़ि नौकरी करने का उसके पास समय शेष न रहता था और राजेश की खानदानी विरासत की दौलत के साथ ही उसकी प्रैक्टिस इतनी बढ़िया चल निकली थी कि कोई जरूरत भी नहीं थी |  दमयंती अपनी दिनभर की दौड़ भाग के बावजूद अत्यन्त खुश थी |  राजेश का प्रेम दमयंती को सम्मोहित किये हुए  था |

                 जीवन अत्यन्त सुखद था जब तक की रघु नहीं आया था |  लगभग एक साल पहले राजेश के कॉलेज का दोस्त डॉ रधु अवस्थी सपत्नीक आया था | उसकी पत्नी डॉ विभा भी उनकी सहपाठी ही थी | दोनों का प्रेमविवाह हुआ था |  राजेश ने उस दिन अस्पताल से छुट्टी ले ली थी |  सभी ने साथ में खाना खाया था |  वो बर्तन समेट कर किचन में ले गई थी और आइसक्रीम लेकर जब वापिस ड्रॉइंग रुम की तरफ जा रही थी तो अपना जिक्र सुन रुक गई थी 

“दमयंती ..!  हा हा हा .. वो तेरे प्लान से वाकिफ नहीं थी .. मैंने उसे देखकर बहुत मुश्किल से हंसी दबा कर रखी थी .. तूँ राजेश बड़ा शातिर निकला ..”  रघु की हंसी की आवाज आ रही थी | 

“क्या मतलब ? ..” कुछ असमंजस भरी यह आवाज़ विभा की थी 

“याद करो  विभा जब हम कॉलेज में थे तब मैं न कहता था ..यह शादी करेगा किसी नर्स से ही  .. वो इसके डॉक्टर होने के कारण हमेशा अहसानमंद रहेगी और इसे पत्नी के साथ साथ एक नर्स भी मिल जायेगी जो जिंदगी भर सेवा करेगी ..वो भी फ्री में ..साल दो साल में बच्चा हो जायेगा तो फंसी रहेगी और देखो तो इसने क्या किया है ..जैसे नक्शे के ब्ल्यूप्रिंट से हूबहू ईमारत खड़ी कर दी है ..”  

                          रघु की ठहाका मार कर हंसने की आवाज उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर रही थी |  खुशियों की फुलवारी सी लगने वाली अपनी जिंदगी दमयंती को अचानक एक गाली जैसी लगने लगी थी  ,  गले में पहना मंगलसूत्र उसे कईं क्विंटल का भारी बोझ सा लगने लगा था .. उसकी स्वांस घुटने लगी जैसे कोई गला घोंट रहा हो ..उसके हाथ से आइसक्रीम की प्लेट गिर पड़ी और वो गिर कर बेहोश हो गई थी | उसे अस्थमा का अटैक हुआ था | 

                     पिछले एक साल से दमयंती मशीन जैसी हो गई थी |  हँसना मुस्कुराना सब भूल गई थी  |  सब काम पहले की तरह करती थी  पर एक जिम्मेदारी की तरह ,  उसका चेहरा बुझ सा गया था और स्वांस की भारी तकलीफ के चलते रोजाना अस्थमा का पम्प लेना पड़ता था |  राजेश की किसी बात का वो कोई जवाब नहीं देती थी और इसीलिये बातचीत भी लगभग बन्द सी हो गई थी |  दोनों का रिश्ता धीरे धीरे टूटने की कगार पर था | 

                     लगभग एक बरस बाद आज फिर से डॉ रघु और उसकी पत्नी डॉ विभा आई हुई थी |  सबने साथ ही खाना खाया था |  माहौल बहुत भारी था |  रघु और विभा अपराधबोध में थे |  बर्तन उठाकर जैसे ही दमयंती किचन में आई उसके पीछे पीछे डॉ विभा भी आ गई थी |  

“देखो दमयंती उस दिन जो कुछ तुमने सुना वो सब सच था पर कुछ ऐसा भी है जिसके बारे में मैंने काफी सोच विचार कर निर्णय लिया है कि तुम्हे पता होना चाहिए ..हो सकता है तुम राजेश को माफ़ कर दो ..” कहते हुए विभा ने एक पुराना सा तह किया हुआ कागज दमयंती की तरफ बढ़ा दिया 

“..लेकिन एक विनती है इसकी कोई भनक रघु को न लगने पाए वरना मेरी गृहस्थी तबाह हो सकती है ” विभा तेज कदमों से वापिस चली गई |  दमयंती ने कागज खोल कर पढ़ा , यह राजेश का विभा को लिखा पत्र था ..
” प्रिय विभा , 

                       मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ और इस बात से भी सहमत हूँ कि हम दोनों इतना कमा लेंगे कि एक नर्स रखना आराम से अफोर्ड कर सकेंगे | लेकिन तुम शायद मेरी बात को समझ ही नहीं पाई थी और इसमें तुम्हारा दोष भी नहीं है क्योंकि रघु अपने खिलंदड़ स्वभाव के चलते मेरी इस एक बार कही बात को बिना भावार्थ समझे पकड़ कर बैठ गया है और कभी भी मौका मिलने पर दोहराना नहीं भूलता |  तुमने भी शायद उसकी बात सुन सुन कर यही अर्थ निकाल लिया कि मुझे किसी प्रशिक्षित नर्स की जरूरत है |  एक डॉक्टर होने के बावजूद “नर्स” का अर्थ न तुम समझी न ही रघु .. विभा , मैं एक खाते पीते घर से हूँ जहां पांच दस नर्सें भी आराम से अफोर्ड की जा सकती है पर मेरे पिताजी के बार बार कहने पर भी मेरी माँ ने कभी मेरे विकलांग होते हुए भी मुझे किसी नर्स के हवाले नहीं किया बल्कि खुद ही सम्हाला ..

                      उनका कहना है कि एक माँ और एक पत्नी से बढ़कर कोई नर्स नहीं हो सकती |  नर्स का आशय है प्रेम और करुणा ..मेरी पत्नी एक नर्स होगी ऐसा इसलिये नहीं कहा था कि किसी नर्स से ही शादी करूँगा बल्कि मेरी पत्नी मुझे इतना प्रेम करेगी कि वो मेरी उसी तरह नर्स हो जायेगी जैसे कि आज  मेरी माँ  है  |  तुमने तो पिछले खत में ही नर्स रखने की बात कह दी थी ..माफ़ करना मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ ..रघु तुम्हे बहुत प्रेम करता है ,  तुम्हे खुश रखेगा उससे शादी के बारे में विचार करना, तुम्हे कोई नर्स भी नहीं रखनी पड़ेगी .. और हाँ मुझे दमयंती मिल गई है, बिलकुल वैसी लड़की जो मुझे पूरी जिंदगी नर्स बनकर सम्हाल सकती है और इसका कारण यह नहीं है कि वो एक प्रशिक्षित नर्स है  बल्कि इसलिये , क्योंकि उसकी आँखों में मैंने अपने लिये दया नहीं प्रेम देखा है और मुझे भी जीवन में पहली बार मुहब्बत का अनुभव हुआ है |  अगले महीने हमारी शादी है हो सके तो जरूर आना | 

                                             तुम्हारा  कोई नहीं 

                                                   राजेश 

                    दमयंती की साँस बहुत तेज हो गई थी , उसके चेहरे पर जैसे खून दौड़ पड़ा था .. उसे लग रहा था ताजा हवा के झोंके चल पड़े थे .. वो एक बरस की घुटन से आज़ाद हो गई थी उसे अब  सब के जाने का बेसब्री से इंतज़ार था क्योकि उसे राजेश से लिपट कर फूट फूट कर रोना था ..

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