● दर्द ●

मीना रात के उस सन्नाटे में कमरे की खिड़की से बाहर सड़क की तरफ मुँह किये चुपचाप खड़ी थी | कमरे में धुप्प अँधेरा था ..उसकी जिंदगी की तरह और दूर कहीं रोड़ लाईट का बल्ब टिमटिमा रहा था उसके बेटे आकाश की तरह ..बस उसे ही निहार रही थी | धीरेंद्र को गुज़रे हुए आज पूरा एक महीना हो गया था |  उसका पति स्व0 धीरेंद्र प्रकाश  अपनी अट्ठावन साला जिंदगी हंसते खेलते जिया था |  राज्य सरकार में क्लर्क की अपनी नौकरी से कितना कुछ कर गया था ..दोनों बेटियों  की शादी भी कर दी थी  और यह मकान भी उसने ही बनवाया था |  एक काम था जो वो नहीं कर पाया था और वो था अपने बेरोजगार तीस वर्षीय पुत्र आकाश का विवाह ..यह उसकी ईच्छा अपूर्ण ही रह गई   थी |  कितना प्रयास किया था  उसने पर सब जगह से या तो नकारात्मक जवाब आता या कोई जवाब ही नहीं मिलता  |  धीरेंद्र को इस बात की बड़ी चिंता थी |  अभी कुछ महीनों पहले जब वो बीमार नहीं पड़ा था तब दीनदयाल जी के यहाँ गया था आकाश का रिश्ता लेकर ,  उनकी बिटिया सुमन दसवीं में फेल होकर पढ़ाई छोड़ चुकी थी और आकाश ने तो समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री ली हुई थी इसीलिये धीरेंद्र को बहुत उम्मीद थी कि मना नहीं करेंगे ,  लेकिन उन्होंने तो दो टूक कह दिया था कि वो तो सरकारी कर्मचारी ढूंढ रहे हैं |  धीरेंद्र ने बात को तब अपनी आदतानुसार हास्य का रंग दे कर ठहाका मारते हुए कहा था  ” सरकारी नौकरी तो मृतक राज्य कर्मचारी कोटे में मेरे मरणोपरांत ही मिल सकती है और इतना वादा कर सकता हूँ कि बीमार पड़ा तो दवा पानी नहीं लूंगा..आप तो बस हाँ कर दो..” 

                    ह्रदय की बीमारी में दवा काम आई और न दुआ ..हँसने हँसाने वाला धीरेंद्र दो महीने की बीमारी के बाद चल बसा था और उसकी जगह उसके पुत्र को सरकार में नौकरी मिल गई थी |  

                    पिछले एक महीने में आकाश के लिये एक से बढ़ कर एक रिश्ते आ रहे थे |  आने वाले अधिकतर रिश्तों के लिये धीरेंद्र ने कभी न कभी बात चलाई थी |  हर आने वाला रिश्ता मीना का दर्द बढ़ाता ही था |  दुनिया का बदलता रंग साफ नजर आ रहा था | आज जब दीनदयाल जी आए थे अपनी दसवीं फेल बेटी का रिश्ता लेकर ..मीना ताज्जुब से उनको देखती रह गई |  उसे कहने के लिये इससे कठोर शब्द नहीं मिले कि वो अपने पुत्र आकाश के लिये एक पढ़ी लिखी लड़की ढूंढ रही है  | लेकिन अपने धीरेंद्र के स्वभाव के विरुद्ध बोले गए ये शब्द उसका दर्द कम करने की बजाय उसके खुद के ही कानों में गूंज कर दर्द बढ़ा ही रहे थे ..बत्तीस वर्ष धीरेंद्र की परछाई बन कर रही मीना धीरेंद्र के देहांत के बाद जो कुछ भी करती या बोलती तो यही सोचकर कि धीरेंद्र होता तो क्या करता.. क्या कहता.. ?  आज पहली बार उसने इस बात का विचार ही नहीं किया था.. धीरेंद्र के बजाय उसने आज दीनदयाल जी का ही  अनुसरण कर लिया था |

मुड़ कर दीवार पर लगी धीरेंद्र की तस्वीर को देखा जिसमें वो खिलखिला कर हंस रहा था उसे लगा अभी ठहाका मार कर कहेगा ..”नकचढ़ी कहीं की “

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