● तौबा ● 

होली के दिन थे और ऑफिस में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भाई झुलिया ने ड्राईफ्रूट में मिक्स भांग तैयार की थी जिसे मैंने  सप्रेम  ग्रहण कर  लिया  था |  लगभग एक घण्टे बाद घर को चल पड़ा | 

               ….मुझे भयंकर टेंसन हो रही थी ..बिजली के खम्भे पर लगे होर्डिंग के पोस्टर में बर्निंग ट्रेन साफ साफ बर्न हो रही थी ..उस आग से पोस्टर के जल जाने की आशंका बलवती हो रही थी ..पोस्टर के जल जाने पर बिजली के खम्भे से तार शॉर्ट सर्किट होकर गिरे तो सीधा मेरे ऊपर ..ट्रेन आने का नाम नहीं ले रही थी और मैं उस रेलवे क्रॉसिंग के बेरियर पर खड़ा खड़ा हलकान हुए जा रहा था …|  अंततः ट्रेन आई और गुजर गई तो मैंने मोटर साईकिल स्टार्ट की और एक दम सरपट निकल भागने को फुल रेस दे दी ..गाड़ी एक सूत अपनी जगह से नहीं हिली ..मुझे हॉलीवुड की फाइनल डेस्टिनेशन मूवी याद आ रही थी .तारों को जलते हुए मेरे ऊपर गिरना ही था और ….मार्च के उस महीने में मैं जून जुलाई के कोटे का पसीना भी छोड़ चुका था ..मन हो रहा था कि गला फाड़ कर चिल्लाऊं, लेकिन मुझे दुनियां जहान मुर्ख लग रही थी जो मेरी व्यथा नहीं समझ सकती थी  ..सारी भीड़ जब चली गई और मैंने मोटरसाइकिल को रेस दे देकर काफी शोर पैदा कर दिया तब एक भले आदमी ने मुझे पीछे से थपथपाकर बताया कि मैंने गाड़ी गियर में तो डाली ही नहीं थी ..उस देवदूत सरीखे मनुष्य को मैंने भरी आँखों से गाड़ी से उतर कर चरण स्पर्श कर आभार व्यक्त किया  और चल पड़ा |  

                           रास्ते में कॉलेज आती थी |  मैं कॉलेज के सामने से निकल रहा था तब लगा कि कॉलेज खतम ही नहीं हो रही थी ..बड़ी भयंकर बात लगी ..उतर कर मोटर साईकिल स्टैंड पर खड़ी की और पैदल जाकर देखा ..कुछ दुरी पर कॉलेज की सीमा समाप्त हो रही थी ..मैंने राहत की साँस ली लेकिन यह भी समझ चुका था कि मोटर साईकिल की आवाज से बिदक कर यह सीमा लम्बी हो रही थी ..इसलिये जब तक कॉलेज की सीमा समाप्त नहीं हुई ,  पैदल ही मोटर साईकिल घसीट कर ले गया ..और सीमा समाप्त हो गई |  मैं विजेताओं के अंदाज में मोटर साईकिल स्टार्ट कर घर की तरफ उड़ चला |  रास्ते में और भी कई आफ़तें आई जिसे मैं अपनी तत्कालीन कुशाग्र बुद्धि से निपटाता गया लेकिन असली आफत तो आगे इंतजार कर रही थी |  

                       घर में घुसते ही मैं सीधा अपने कमरे में गया और कपड़े बदले बगैर ही बिस्तर में जा घुसा |  बाहर से चाय पानी इत्यादि की पूछताछ की आवाजें आई जिसे मैंने सख्ती से मना कर दिया और अपने दोनों हाथों की अंगुलियां एक दूसरे में फंसा कर सिर के नीचे दबा कर लेट गया |  कुछ मिनट नींद आई होगी की वापिस आँख खुल गई |  अब एक बड़ी आफत आ चुकी थी ..सिर के नीचे दोनों हाथों की अंगुलियां आपस में फंस गई थी |  मैं बुरी तरह घबरा गया था |  अब मैं जिंदगी में बनियान पहनने लायक भी नहीं रहा था |  नियति के इस क्रूर मजाक से मेरा ह्रदय व्यथित हो उठा था |  मैं इस भयंकर स्थिति में उठ कर भी नहीं बैठ सकता था |   मैं अपनी हालत पर पता नहीं कितनी देर चुपचाप रोता रहा  | अचानक कमरे का दरवाजा खुला और असहनीय तीव्र दुर्गन्ध से मैं छटपटा उठा ..वो मेरा मित्र गिरिराज था जो मेरे एक दम पास आकर खड़ा हो गया था ..उसके जुराबों की उस भयंकर बदबू से बचने के लिए मैं एक झटके से अपने हाथों का लॉक खोलने में कामयाब हो गया और उठकर खड़ा हो गया  |  अत्यन्त प्रशन्नता से मैं Giriraj के कंधे पकड़ कर चिल्ला रहा था .”खुल गया ..खुल गया ..खुल गया ”  उसने मेरी चीत्कार से कोई पॉजिटिव संज्ञान नहीं लिया और उलटा रोने लग गया |  

                         मैंने देखा वो अपने दोनों हाथ एक दूसरे में अंगुलियां फंसाए खड़ा था ..अंगुलियां लॉक्ड हो चुकी थी |  मैंने तत्कालीन कुशाग्र बुद्धि का भरपूर उपयोग करते हुए उसके बदबूदार मौजे खुलवा कर उसकी नासिका के अग्र भाग को स्पर्श करवाया  और एक झटके से उसका उँगलियों का लॉक भी खुल गया |  उसने मुझे धन्यवाद ज्ञापित करते हुए मेरी भूरी भूरी तारीफ की , फिर वो चला गया और मैं सो गया |

                        तब से आज तक भांग को तौबा ..

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