● डर ●

“मैं आत्महत्या कर रही हूँ .. जिसकी जिम्मेदार मैं स्वयं हूँ इसके लिए किसी को परेशान न किया जाय | आज से पांच साल पहले मैंने आज का दिन आत्महत्या के लिए तय कर लिया था ..” 
इंस्पैक्टर खुराना अपने अधिकारी डीएसपी हरीश वर्मा की पत्नी की लाश उनके बैडरूम में बरामद होने

की सूचना पर तफ्तीश के लिये आया था |  वर्मा जी सीने पर हाथ बांधे खड़े थे | भावहीन चेहरे पर अश्रुधारा बह कर सूख चुकी थी | मिसेज वर्मा ने अपने हाथों की नशें ब्लेड से काट ली थी | उस बैडरूम में डबलबैड के पास ही एक सोफा चेयर पर उनकी निष्प्राण देह थी | चेहरे पर शांति के ऐसे भाव थे मानो गहरी नींद में सो रही थी |  पास ही स्टडी टेबल पर पेपर वेट से दबा सुसाइड नोट मिला था |  सोफे के नीचे  दोनों हाथों से बह कर  खून जम चूका  था |

वर्मा जी ने शुबह दिल्ली से आकर सबसे पहले यह दृश्य देखा था और फोन पर थाने में सूचना दी थी |  उन्होंने बताया कि रात को लगभग 11 बजे उनकी मिसेज वर्मा से लम्बी बात हुई थी |  कल ही उनकी लड़की ऋचा की शादी हुई थी |  बारात दिल्ली से आई थी | मिसेज वर्मा ने ही जिद करके उन्हें बेटी को दिल्ली तक विदा कर आने के लिये भेजा था और खुद को कुछ ज्यादा थकी हुई बताते हुए साथ नहीं चली थी |  खुराना वही सुसाइड नोट पढ़ रहा था 

“.. सुसाइड नोट सामान्यतया बहुत छोटा होता है , क्योंकि लोग भावावेश में इस तरह का निर्णय लेते हैं पर मैं तो इंतजार कर रही थी हमारी ऋचा की शादी का क्योंकि उसके बाद इस देह का अंत कर मुझे मुक्त होना था उस अपराध बोध से जिसका कोई और उपचार न था | इसलिये इस पत्र में मैं अपनी कहानी लिख रही हूँ |  इस कहानी के हीरो आप मेरे पति वर्मा जी को मान सकते हैं पर वास्तव में यह कहानी एक खलनायक और एक खलनायिका की है  |  खलनायिका मैं स्वयं हूँ और खलनायक है मेरा डर .. जो पैदा तो मेरे साथ हुआ था  पर अब इसे यहीं छोड़े जा रही हूँ | मेरा जन्म आज से लगभग 50 साल पहले हुआ था और मैं अपनी दो बड़ी बहनों के बाद तीसरी संतान थी | जब माँ की कोख में थी तब भी डरने का पर्याप्त कारण मुझे प्राप्त था क्योंकि मैं एक बेटी थी और उस माँ के घर में पैदा होने जा रही थी जिसने बेटे की चाहत में गर्भधारण किया था |  माँ की कोख से मैं डरी डरी सी पैदा हुई और दुनिया में मैंने देखा कि यहां  सब डर के साए में ही जीते हैं |  यहाँ छोटे से बच्चे को डराना शुरू किया जाता हैं जब वो दूध नहीं पीता, जब वो शैतानी करता है,  जब वो रात को सोता नहीं है |  हर बार उसे डराया जाता है एक भयानक राक्षस से जिसकी लाल लाल आँखें हैं बड़े बड़े दांत और लंबे नाख़ून .. उसका नाम कहीं भूत कहीं डेविल तो कहीं जिन्न है |  छोटे से बच्चे को अविश्वास करना नहीं आता वो सब कुछ सत्य मानकर डर जाता है और उसके दिमाग की नींव में वो डर बहुत आसानी से घर करता जाता है |  बड़े होने पर स्कूल का डर स्कूल में टीचर का डर  |  घर पर पिताजी को शिकायत हो गई तो उनकी पिटाई का डर और अगर बीमार भी हुए तो सुई लगने का डर |लड़कियाँ घर से निकलें तो किसी शोहदे के छेड़छाड़ का डर और विरोध करें तो “निर्भया” बना दिए जाने या तेज़ाब फैंक दिए जाने का डर ,  विरोध न करें तो बदनामी का डर  | महिलाएं ऑफिस में काम करने जाएं तो सहकर्मी से लेकर अधिकारियों तक की लोलुप आँखों का डर | हम डर डर कर ही बड़े होते हैं और हम में से कुछ बड़े होकर डर के मारे डराना शुरू कर देते हैं और कुछ उम्र भर डरते रहते हैं |  जो बहुत ज्यादा डर जाते हैं वो हिंसक हो जाते हैं ,  आतंकवादी ही बन जाते हैं |  हमारे सभी धर्म डर पर आधारित हैं और सब के सब मृत्यु आधारित .. हर धर्म मृत्यु के बाद की स्थिति के लिये जीने को कहता है |  कोई मोक्ष या स्वर्ग के लिये जीने को कहता है कोई जन्नत के लिए तो कोई हैवन के लिये , और इन में से कोई अगर सत्य है तो इनको पाने के लिये मरा जाना चाहिए , इनके लिए जिया भला कैसे जा सकता है ? लेकिन मृत्यु का डर सब धर्मों का आधार है इसीलिये प्रत्येक उपदेश का उद्देश्य मृत्यु के बाद का “जीवन” है |  हमारा सिस्टम डर आधारित है | ट्रैफिक पुलिस दुपहिया वाहन चालक को बिना हेलमेट पकड़ लेंगे ,  डर है कि वो एक्सीडेंट करेगा और सिर फुड़वा लेगा |  सीट बेल्ट न बंधा हो तो डर कि कहीं दुर्घटना में मारे जायेंगे | तम्बाकू बीड़ी सिगरेट पर डरावने फोटो लगाये जाते हैं पर उनका उपयोग कानूनी अपराध घोषित नहीं किया जाता | सरकार को डर है कि राजस्व में कमी आ जायेगी इस लिये रोक नहीं लगाती और व्यसनियों को डरा कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेती है | हम इतने डरे हुए हैं कि डर के ही व्यसनी हो चुके हैं | हमे डराने के लिये टीवी पर बाकायदा प्रशिक्षित लोग आते हैं |  बुरी से बुरी खबरें हमे डराने के लिये प्रोफेशनली डरावनी बनाई जाती है | हमें बार बार सावधान रहने की ताकीद करते हुए डराया जाता है, और यह डर हम पैसा देकर खरीदते हैं | हम उस युग में जी रहे हैं जहां विश्वास करना बेवकूफी की निशानी माना जाता है  |  हम घर के बाहर खड़ी बाइक को , खिड़की में लगे कूलर को,  ट्रेन में लगेज को और तो और प्याऊ के लोटे तक को चोरी के डर से चेन से बांधते हैं  | इस काल खण्ड में पली बढ़ी मैं अगर डर गई तो क्या अनोखा हो गया ?  यह सब मैं पिछले पांच साल से खुद को समझा समझा कर जी रही थी  |  आज से लगभग 5 साल पहले मैं वर्मा जी और अपनी बिटिया ऋचा के साथ इंद्रा नगर के शिवमंदिर में दर्शन करने गए थे | यह भूलीबिसरी सी कहानी वहीं से वापिस मेरी जिंदगी में आ गई थी |  हम जब दर्शन कर के लौटे तो काफी दूर पार्क की हुई कार में बैठते ही मेरी वाली साइड में “वो” आकर खड़ा हो गया था | उसका दिमागी सन्तुलन शायद बिगड़ चूका था | उसकी आँखों में वहशत थी और वो किसी जानवर की तरह गुर्रा उठा ..

“तुम्हारी उस एक गलतफहमी ने तीन तीन परिवार तबाह कर दिए , मंगनी के बाद उस दिन मैं तुम्हे अपनी कार में बिठा के यहीं लाने वाला था ,  देखो यही वो जमीन का टुकड़ा है जिस पर मैंने आशियाना बनाने की सोची थी ,  मेरे बूढ़े माँ बाऊजी कितने खुश थे ,  तुमने उनकी हत्या कर दी ,  उस दिन के एक साल में माँ चल बसी और बाउजी अगले दो साल जिन्दा लाश बनकर रहे फिर वो भी चल बसे , मैं तो कहीं का ना रहा , कम्पनी की नौकरी से निकाल दिया गया और फिर कभी किसी ने नहीं रखा मेरा दोस्त रोहित .. रोहित खन्ना जिसे हम लौहपुरुष कहते थे ,  वो फांसी खा गया….” चेहरे पर कई दिनों की सफेद काली खिचड़ी सी दाढ़ी और बदन पर सामान्य से कपड़े  पहने वो संजीव था | वो बोलता बोलता रुंध गया था और घुटने से कार पर टक्कर मारने लगा | 

“इतना कुछ हो जाने के बाद तुम आज भी नहीं बदले ..”  मुझे उस आदमी को देख कर ही नफरत हो रही थी | ” यह इंद्रा नगर है शहर के उत्तर में और तुम जहां अरेस्ट हुए वो एरिया दक्षिण में था.. और मैं जो गवाही देने कोर्ट नहीं आई थी , तो सिर्फ तुम लोगों के घरवालों से सहानुभुति के कारण .. और इसीलिये तुम सन्देह का लाभ पा कर छूट गए थे ..तुम्हे आज भी पश्चाताप नहीं हो रहा बल्कि एक नया झूठ.. ..चलिये हरीश जी ”  मैं अपने साइड की विंड स्क्रीन बन्द करते हुए ड्राइवर सीट पर बैठे अपने पति को गाड़ी बढ़ाने करने का इशारा करते हुए बोली | उन्होंने कुछ सोचते हुए एक्सीलेटर पर दबाव बढ़ा दिया |  वो गलीज आदमी पीछे छूट गया था | पीछे की सीट पर बैठी मेरी 18 साल की बेटी ऋचा काफी परेशान नज़र आ रही थी | 

“यह सब क्या था ?  कौन है यह आदमी ” ऋचा ने भारी उत्सुकता से पूछ रही थी … मैंने उसे इस बारे में कभी कुछ बताया नहीं था |  लेकिन अब वो बालिग हो चुकी थी  तो बताने में कुछ हर्ज़ न था .. 

                   “20 साल पहले की बात है ..” मैं उसे धाराप्रवाह कहती गई  ” पिताजी ने अपने दोस्त श्याम लाल जी के लड़के संजीव से मेरी मंगनी तय कर दी थी | मंगनी हुए महीना भर हुआ था |  मैं उससे इस एक महीने में दो बार मिल चुकी थी |  उसकी बातचीत दोनों बार अपने माँ और पिताजी के सपनों के बारे में ही रही |  वो इकलौती संतान था और बताता रहता कि कैसे संघर्षों से उसे पाला गया था और अब इंजीनियर बनके जब वो इतनी बड़ी कम्पनी में एक्जीक्यूटिव लग गया है,  कैसे उनके सपने पूरे करेगा |  किराये के मकान में पूरी जिंदगी निकाल चुके माता पिता को अच्छा सा मकान बना कर वो गिफ्ट करना चाहता था |  उसकी पोस्टिंग दिल्ली थी , हमारे शहर से 500 किलोमीटर दूर | उस दिन वो दिल्ली से आया था और दिन में चार बजे मुझे फोन कर के मेरे घर के पास किसी जगह पर बुलाया था और साथ ही घर पर किसी को बिना बताए आने की ताकीद की थी |  उसके इस आग्रह से मेरे मन में आशंकाएं उठ खड़ी हुई थी | फिर भी मैं हिम्मत कर के  उसकी बताई जगह पर पहुँच गई | वहां पर वो कार लेकर आया हुआ था | उसके पास कार देखकर मैं और शंकित हो गई | मुझे पता था कि उसके पास कार नहीं थी |  मैं चुपचाप कार में उसके साथ आगे की सीट पर बैठ गई | उसने गहरे काले काँच वाला  धूप का चश्मा पहन रखा था |  कार के शीशे गहरे काले थे जो सब बन्द थे ..अंदर ऐसी चल रहा था | उसके चेहरे की मुस्कान मुझ में डर बढा रही थी | उसने गाड़ी स्टार्ट कर दौड़ा दी |  हमारे बीच हैल्लो हैल्लो के अलावा कोई  बातचीत नहीं हुई थी |  कुछ देर में उसने सड़क किनारे गाड़ी रोकी तो दो उसी की उम्र के लड़के कार की पिछली सीटों पर आकर बैठ गए गाड़ी फिर चल पड़ी |  हम शहर से दक्षिण की ओर शास्त्रीनगर वाली रोड़ पर बढ़ रहे थे | उन दोनों से मेरा परिचय करवाया गया | एक का नाम अतुल शर्मा था जो सीए था और दूसरा जो कुछ ज्यादा लम्बाचौड़ा था वो रोहित खन्ना था जो कि वकील था |  मेरा डर गहरा रहा था |  एक इंजीनियर के दोस्त वकील और सीए .. |  मुझे बताया गया कि बचपन से ही तीनों दोस्त है | मैंने यूँ ही बेख्याली में  अपनी सीट के सामने वाले डेशबोर्ड को खोला तो मेरे छक्के छूट गए ..अंदर एक दारू की बोतल पड़ी थी और एक तेज फल वाला चाकू .. मैंने उनकी तरफ नज़र दौड़ाई .. वो लोग अपनी ही बातचीत में व्यस्त थे  मैंने धीरे से उसका गेट बंद कर दिया .. मैं बुरी तरह से डर गई थी | खुली सड़क थी और गाड़ी तेज गति से दौड़ रही थी | शास्त्रीनगर पहुंचने के बाद संजीव ने पीछे मुड़कर देखा .. दोनों ठहाका लगा कर हंस रहे थे |  संजीव ने एक जगह गाड़ी रोकी … “13 बटे 45  ” वो बोला मैंने उसकी नजरों का पीछा करते हुए देखा वो एक मकान की नेम प्लेट पढ़ रहा था |  किसी सुमेर सिंह का नाम लिखा था | 

“यह किस का मकान है ….?”  मुझे अपनी आवाज कुएं में से आती लगी |  पीछे बैठे दोनों लड़के हंस रहे थे |  भयंकर हँसी |  मेरा रोम रोम पसीने छोड़ रहा था | संजीव असमंजस में था..वो उनके साथ था मेरे डर का उसके ऊपर कोई फर्क नहीं था ..

फिर मैं एक झटके से गाड़ी का गेट खोल कर निकली और तीर की तरह सरपट भाग निकली |  वो तीनों मेरे पीछे भाग रहे थे |  मैं तेजी से रास्ता पार करती गई और पिताजी के दोस्त गिरधारी अंकल के घर पहुंच गई |  जब मैं वहां कॉलबेल बजा रही थी इतने में वो तीनों वहाँ पहुंच गए |  वो कह रहे थे कि मुझे गलतफहमी हुई है .. वो अभी भी हंस रहे थे | मैंने उन्हें पुलिस की धमकी देकर चले जाने को कहा तो संजीव मेरा हाथ पकड़ कर जबरन ले जाने की कोशिश करने लगा | इतने में गिरधारी अंकल  गेट खोल कर बाहर आ गये और मैंने अंदर घुस कर गेट बंद कर लिया | वहीं से मैंने पुलिस को फोन किया और वो तीनों अरेस्ट हो गए | ”   मैंने बेटी को सगर्व सारा किस्सा सुनाया | 

“माई ब्रेव मॉम..” वो किलकारी सी मारती मुझसे लिपट गई | 

“तुम्हारे पापा को आज भी उनकी नियत पर संदेह है, उनका कहना है कि मैं कुछ ज्यादा ही डर गई थी |” 

“क्यों पापा ?” 

“बस ऐसे ही बेटा ..कभी कभी जो दिखता है वो सही नहीं होता ..” पटाक्षेप करते हुए  हुए हरीश जी ने एफ़एम  चालू कर दिया |

“पापा आप को क्यों लगता है कि वो तीनों बेकसूर हो सकते हैं ?” ऋचा खाना खाते खाते बोली |  घर पहुंचे दो तीन घण्टे हो चुके थे |  हम तीनों डाइनिंग टेबल पर खाना खा रहे थे |  उस घटना के बाद से ही ऋचा चुप चुप सी थी |  शायद यह बात उसके ज़हन में अभी भी घूम रही थी | हरीश जी ने उसे गौर से देखा फिर मुझे .. यह प्रश्न उन्हें मेरे चेहरे पर भी दिखाई दिया होगा | वो कहने लगे ..

“बेटा मैं तब शास्त्रीनगर थाने में सब इंस्पेक्टर हुआ करता था | जब तुम्हारी मम्मी ने फोन किया तो उन तीनों को अरेस्ट करने मैं ही पहुंचा था | कार में शराब की बोतल और चाकू भी बरामद हुए थे और जिस 13 बटे 45 सुमेर सिंह के मकान के आगे उसने कार रोकी थी उसे भी थाने बुलाया गया |  उसने जो बयान दिया वो भी उन तीनों के खिलाफ ही जाता |  वो एक उम्रदराज आदमी थे जो अपने बेटे के साथ दिल्ली में रहते थे |  शास्त्री नगर वाला उनका मकान बरसों से बंद पड़ा था |  वो पहले भी अपनी कोठी में लोगों के अनधिकृत प्रवेश की शिकायत पुलिस को  दर्ज करवा चुके थे | उनका कहना था कि जब भी वे छह आठ महीनों से दिल्ली से आकर मकान खोलते तब  उनके मकान में कई बीयर दारू की खाली बोतलें और अन्य आपत्तिजनक सामान बरामद होते रहे है | केस इतना खुला खुला सा था कि तीनों को सजा होना बस वक्त की बात थी | तीनों पर अपहरण की साजिश और अपहरण की कोशिश करने के मामले दर्ज हुए थे …”

“फिर भी आप को संशय क्यों है ?” 

“मुझे संशय तब भी था | इसके कई सारे कारण थे |  सबसे पहला कारण ये कि तीनों हाइली क्वालिफाइड थे और उनका कोई ऐसा पूर्व रिकॉर्ड नहीं रहा था |  दूसरा ये कि जो कार हमने बरामद की थी उसका मालिक यशपाल सक्सेना था जो तब शहर के रईसों की  गिनती में आता था , जरायम पेशा था और तीनों में से एक एडवोकेट रोहित खन्ना जिस वकील के अंडर में प्रैक्टिस करता था , उस का क्लाइंट था | वो कार के अंदर के सामानों की मिल्कियत से मुकर गया जब की तीनों का कहना था कि उन्होंने जिंदगी में दारू नहीं पी और डेशबोर्ड तो खोला तक नहीं था |  लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो सकती थी |  मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार तीनों में से किसी के रक्त में अल्कोहल नहीं मिला था | चाकू पर किसी तरह के उँगलियों के निशान नहीं मिले थे | और इसी से सिद्ध होता था कि उनका उस चाकू से कोई लेनदेन नहीं था |  फर्ज करो कि चाकू उन्होंने ही रखा होता तो उनका उद्देश्य सिर्फ धमकाने का होता वे भला उँगलियों के निशान  क्यों मिटाते ? तीसरे जो बात सुमेर सिंह जी ने कही थी और जो उनके खिलाफ जाती थी कि उनके घर में दारू और बीयर की बोतलें पहले भी मिली थी , मेरी नज़र में  यही बात  उनके पक्ष की थी | किसी ख़ाली घर में घुस कर जुआ खेलना और दारू पीना यह जिस किस्म के लोगों का काम हुआ करता है ,  ये तीनों उस किस्म से नहीं आते थे | तीनों वैल सैटल्ड थे और सम्मानजनक पेशों मे थे |  अगर उनको दारू ही पीनी होती तो वो शहर के किसी बार में जा सकते थे | चौथा कारण था उनकी आँखें .. एक पुलिस वाला अपराधियों की आँख में आँख डाल कर देखता है और झूठ सच का फैसला कर लेता है | उनकी आँखे सच्ची थी | तीनों को अलग अलग लॉकअप में रख कर बयान लिए गए | उन्होंने अपने बयान में कहा था कि वो इसे प्लॉट दिखाने ले गए थे |  जो प्लाट के कागज दिखाए गए वो संजीव के पिता के नाम से रजिस्टर्ड थे और उस दिन से दो दिन पहले ही रजिस्टर्ड हुए थे |  लेकिन वो प्लाट इंद्रानगर में था जो कि शहर के उत्तर में था और वे इसे ले गए थे शास्त्रीनगर जो कि शहर से दक्षिण में पड़ता है |  इस बात का जवाब देने की बजाय संजीव बुरी तरह से चौक गया था |  रजिस्ट्री उसकी अनुपस्थिति में हुई थी |  वो इसी बात पर जोर देता रहा कि उसका प्लॉट शास्त्रीनगर में होना चाहिये | इस प्लॉट की रजिस्ट्री उसके दोस्त रोहित खन्ना ने करवाई थी उसका बयान लेने पर उसने प्लॉट इंद्रानगर में होना बताया |  उनके बयान आपस में मिसमेच थे |  उनके अनुसार उन्होंने कुछ रुपये अलग से मिला कर इंद्रानगर के प्लाट की रजिस्ट्री करवा दी थी जबकि संजीव पैसे कम पड़ने के कारण उस प्लॉट को केंसिल कर चुका था |  वो यही समझता था कि शास्त्रीनगर वाले उसके दूसरे पसंद किए प्लॉट की ही रजिस्ट्री हुई है | उनके अतिरिक्त पैसे देने का कोई दस्तावेज नहीं था |  कुल मिला कर उनकी सारी बातें बनावटी और घड़ी हुई मानी गई |  जब प्लॉट की रजिस्ट्री ही हो गई थी फिर भला संजीव उस की लोकेशन से इतना गफलत में कैसे रह सकता था ? उसकी अपने माँ बाप से भी तो बात हुई होगी फिर यह बात उनसे कैसे छुपी रह सकती थी ? उससे छुपी रह भी गई किसी तरह तो वो वकील खुद भी तो था कार में ,  उसने क्योंकर उसे शास्त्रीनगर जाने से नहीं रोका ?  पुलिस ने चार्जशीट तैयार कर कोर्ट में पेश कर दी |  तुम्हारी मम्मी के बयान लेने मैं कईं बार इसके घर गया था |” हरीश जी पानी पीने के लिये रुके | 

” ह्म्म्म … तो यहीं से आप दोनों की लवस्टोरी चालू हुई थी ! ” ऋचा शैतानी से आँखे मटकाते हुए बोली और हम तीनों ठहाका मार कर हंस पड़े |  

              अगले लगभग तीन महीने तक इस बात का फिर कोई जिक्र हमारे यहां नहीं हुआ  | लेकिन तीन माह बाद जो हुआ उसकी मैंने जिंदगी में कल्पना नहीं की थी | 
● वो सर्दियों की एक छुट्टी का दिन था |  दोपहर के लगभग 2 या 3 बज रहे थे |  ऋचा अपने कमरे में पढ़ रही थी  |  मैं  और हरीश जी घर के बाहर लॉन में  कुर्सियां डाले धूप सेक रहे थे | आज का दिन कुछ खास था क्योंकि हरीश जी ने आज घर पर ही किसी को बुला रखा था इसलिये दिन भर मेरे साथ रहने वाले थे वरना उनकी नौकरी में छुट्टी जैसी कोई चीज नहीं थी |  उन्होंने बताया था कि किसी कम्पनी के उच्च अधिकारी ने गबन का कोई मामला दर्ज करवाया था, मामला कुछ एकाउंट्स और वित्तीय संस्थाओं से सम्बंधित था जिसे ढंग से समझने के लिये उन्होंने उस अधिकारी को उनके मुख्यालय मुम्बई से अपने घर पर ही बुला रखा था |  

                      कॉलबेल बजी और मैंने उठ कर लोहे का गेट खोला | सामने अतुल शर्मा खड़ा था | अतुल शर्मा सीए | संजीव का दोस्त | तीन दरिन्दों में से एक |  वो नमस्ते करता हुआ सीधा हरीश जी की तरफ बढ़ा | उसने शायद मुझे नहीं पहचाना था लेकिन हरीश जी को देखते ही जैसे जम गया | हरीश जी भी अवाक से खड़े उसे देख रहे थे | फिर वो धीरे से मेरी तरफ घूमा .. उसकी आँखों में नफरत उतर आई थी | 

“यह मेरी पत्नी है मिसेज वर्मा …” हरीश जी कठोर शब्दों में पीछे से कह रहे थे “…जरा सोच समझ कर और तमीज से बात करना मिस्टर शर्मा ”  उन्हें आशंका हुई थी कि यह बदतमीजी कर सकता है | 

“मुझे मालूम है डीएसपी साहब ..” वो उनकी तरफ घूमता हुआ बोला “.. आपने तो हमारे रिहा होने से पहले शादी कर ली थी और आपको देख कर ही मैं अंदाज लगा सका कि ये वो ही है क्योंकि मैंने इसकी शक्ल तो सिर्फ चन्द मिनटों के लिए ही देखी थी |  लेकिन आपकी पत्नी हो जाने से इस का अपराध कम नहीं हो जाता ” वो अपने पीछे की तरफ मेरी ओर अंगूठे से इशारा करता हुआ बोला  | 

” देखो अतुल, इस बात को बरसों बीत चुके हैं | तुम लोगों ने हमेशा इसे ही गलत ठहराया | लेकिन कई सवाल थे जिनका तुम लोगों के पास कोई जवाब न तब था और न अब है ” हरीश जी ने उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा | वो निढाल सा कुर्सी पर ढेर हो गया | कुछ देर सिर पकड़े और मुँह नीचे किये वो सोचता रहा फिर बोला “आज मैं आपके सब सवालों के जवाब दूंगा .. मैं आपको आज सारी हकीकत बताऊंगा ..” उसने सामने पड़ी पानी की बोतल उठाई और एक साँस में खाली करदी | मैं उसके सामने की दीवार के पास आकर खड़ी हो गई | 

” संजीव अपनी माँ और बाउजी के लिये  मकान बनाना चाहता था और वो भी जल्द से जल्द | उसकी ईच्छा थी कि उसकी शादी हो तब दुल्हन नए मकान में ही आए |  उसने इसलिये काफी पैसे जोड़े थे और जितना मिल सकता था पीएफ का लोन भी लिया था | जमीन खरीद लेने पर उसे हाउस कंस्ट्रक्सन का लोन भी मिल जाता | उसने अपने सारे पैसे रोहित को जमा करवा दिए थे और चूँकि वो एक बड़ी एडवोकेट फर्म में था तो उसी को जमीन का सौदा करवाने का बोल रखा था | यह दुर्घटना जब हुई उससे दसेक दिन पहले संजीव जब आया था तो रोहित ने उसे कई बिकाऊ प्लॉट दिखाए |  उसे और उसके माँ बाउजी को इंद्रानगर का शिवमंदिर के पास का प्लाट पसंद आया था लेकिन उसे खरीदने में उसके काफी रुपये कम पड़ रहे थे तो उन लोगों ने शास्त्रीनगर का एक छोटा प्लॉट आधे मन से पसंद कर लिया | उसे रजिस्ट्री बाउजी के नाम से करवानी थी जिसकी जिम्मेदारी रोहित को देकर वो लौट गया | दूसरे दिन रोहित मेरे घर पर आया | उसने कहा कि यह प्लॉट संजीव मजबूरी में ले रहा है सिर्फ पैसों की कमी के कारण | कुल पचास हजार रूपये कम पड़ते हैं | उसके पास जोड़ तोड़ के कुल अठाइस हजार होते थे , शेष बाइस हजार की व्यवस्था करने के लिए उसने मुझसे कहा | मेरे पास बाइस हजार की व्यवस्था आराम से हो गई | हमने तय किया था कि उसके पिताजी को इंद्रानगर वाले प्लॉट की रजिस्ट्री करवाएंगे लेकिन बताएंगे कुछ नहीं | आप ने डीएसपी साब रजिस्ट्री के कागज देखे थे याद कीजिए संजीव के पिताजी के हस्ताक्षर वाली जगह पर भी अंगूठे के निशान थे ..” 

हरीश जी ने सहमति में सिर हिलाया | 
” हम संजीव के लौटने पर उसे सरप्राईज देना चाहते थे | रजिस्ट्री के समय बाउजी ने मुझसे प्लॉट नम्बर पूछा तो मैंने बता दिया 13 बटे 45 , इस नम्बर को वे देर तक रटते रहे और कहा कि नम्बर याद होंगे तो मकान बनाने के बाद जब बाजार से टैक्सी में घर जायेंगे तो बस यही बताना पड़ेगा  | दो दिन बाद जब संजीव दिल्ली से आया तो हम उसके घर पर ही इकट्ठे हुए थे |  वहां पर एक ही बात चली 13 बटे 45 |  हम बाइक पर उसे जल्दी से प्लॉट दिखाने ले जाने वाले थे लेकिन वो इसके , अपनी मंगेतर के बिना चलने को राजी नहीं था | कहता था कि प्लॉट जितना उसका और माँ बाउजी का है उतना ही इसका भी है क्योंकि शादी के बाद तो घर इसे ही सम्भालना है | इसे भी हमने बाइक पर बिठा कर ले चलने को कहा तो उस का कहना था कि खुली बाइक पर शादी से पहले लड़की को घुमाना अच्छी बात नहीं मानी जाती | इसके घर वाले नाराज़ हो जायेंगे इस लिये यशपाल की काले शीशों वाली कार मांगने के लिये रोहित को तैयार किया | हम पहले भी कई बार उसकी कार मांग कर घूम चुके थे | यशपाल रोहित की फर्म का क्लाइंट था इसलिए वो उसे कभी मना नहीं करता था | मुझे और रोहित को शरारत सूझी | हमने  तय किया था कि इसकी मंगेतर के सामने इसको तंग किया जाय |  जब हम शास्त्रीनगर पहुंचेगे और 13 बटे 45 कोई प्लॉट होगा ही नहीं तो पट्ठे के पसीने निकल आएंगे | वो मंगेतर पर धौस जमाने जो चश्मे लाया था जो कार मंगवाई है , उन सबकी हवा निकल जाएगी |  वो रोहित पर बरसेगा कि उसके खून पसीने की गाढ़ी कमाई उसने किसी फ्रॉड के हाथों डूबवा दी है | तब हम भी कुछ देर दुखी हैरान और परेशान होने का नाटक करेंगे और फिर  जब मामला गम्भीर होता दिखेगा तो सच्चाई बता देंगे | फिर वहाँ से इंद्रानगर चले जायेंगे जहां उसे जीवन की बेशुमार ख़ुशी मिलेगी | लेकिन हकीकत में क्या हुआ था वो आपको पता है | हमने कल्पना भी नहीं की थी कि उसकी मंगेतर हम पर इतना भयंकर आरोप लगा देगी ..” उसकी आँखे जैसे सुलग रही थी | 

“लेकिन तुम लोग  ने  यह बात  पुलिस  बयानों में  क्यों छुपाई ?” 

“हमें गिरफ्तार कर आप लोग जब थाने में लाए थे तभी रोहित के बॉस मिस्टर चक्रवर्ती हमसे मिलने आ गए थे | उनको हमने सारी बातें शब्दशः बता दी थी |  उन्होंने कहा कि बयानों में अगर यह बताया गया कि शास्त्रीनगर ले जाने में सिर्फ तुम दोनों का हाथ है तो संजीव को पुलिस छोड़ देगी और तुम दोनों पर संजीव और उसकी मंगेतर दोनों के  साथ धोखाधड़ी का आरोप लगेगा | जिस शास्त्रीनगर के प्लॉट का सौदा संजीव कर के गया था और जिसकी रजिस्ट्री करवाने का काम तुम्हे बतौर वकील सौंप गया था ,  उस प्लॉट की बजाय किसी दूसरे प्लॉट का सौदा करवाना भी इस षड्यंत्र का हिस्सा माना जायेगा | तब पुलिस कोर्ट में आसानी से साबित कर देगी कि तुमने अमानत में खयानत की थी  |  डीएलसी रेट से ऊपर दिए रुपयों का तुम कोई सबूत पेश नहीं कर सकोगे और पुलिस का स्टैंड होगा कि तुमने या तो कमीशन खाने या इंद्रानगर वाले प्लॉट के मालिक को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए पहले गलत प्लॉट की रजिस्ट्री करवाई और फिर बात को ढकी रहने देने के लिहाज से संजीव की हत्या का प्लान बनाया |  चाकू की बरामदगी और यशपाल से तुम्हारा कार मांग के लाना तुम्हारे ताबूत के अंतिम कील सिद्ध होंगे |  तुम हमारी मुलाज़मत में हो और इस प्रकरण से हमारी फर्म की शान में भी बटा लगेगा | तुम्हें छुड़ाना हमारे लिए जरूरी है इसलिए पुलिस को सिर्फ उतना ही बताना जितना हम कहें | चक्रवर्ती साहब के कहे अनुसार ही हमने बयान दिए  | संजीव खूब गिड़गिड़ाया कि उसकी मंगेतर को असलियत बता दी जाय , असलियत जानकर वो अपनी शिकायत वापिस ले लेगी तो केस ही खत्म हो जायेगा |  चक्रवर्ती साहब का उसकी मंगेतर यानि इस पर ..” वो अपनी ऊँगली मेरी तरफ चाकू की तरह तानता हुआ बोला “… बिलकुल भरोसा नहीं था |  उनका कहना था कि जो लड़की इतना गम्भीर आरोप लगा सकती है , वो बजाय शिकायत वापिस लेने के,  यह सारी सूचना पुलिस को दे सकती है और उसका कुल जमा परिणाम यह होगा कि संजीव बेकसूर सिद्ध हो जायेगा लेकिन तुम दोनों अपराधी | तब हत्या का षड्यंत्र और हत्या के इरादे से अपहरण की धाराएं और जुड़ सकती है .. उन्हें हर हाल में रोहित को बचाना था क्योंकि उससे उनकी खुद की प्रतिष्ठा जुडी थी | हम तीनों ने अपने होंठ सिल लिए .. ”

                  लग रहा था मुझे  किसी ने उठाकर अंतरिक्ष में फेंक दिया था |  मेरा दिल किसी की मुट्ठी में भिंचा हुआ सा फड़क रहा था | मुझे अपने हाथों में कई लोगों के खून के निशान दिख रहे थे .. उस भरी ठंड में भी मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था | अचानक वो उठ कर मेरे सामने आ गया ..उसकी आँखे दहक रही थी “तू हत्यारी है तू हत्यारी है …”उसने मुझे दोनों कंधों से पकड़ कर झिंझोड़ दिया मेरे मूँह से बस एक ही बात निकल रही थी “मैं डर गई थी ..मैं डर गई थी ..मैं डर गई थी ” 

मैंने उसी दिन खुद की यह सजा मुकर्रर कर दी थी | ऋचा की शादी पर्यन्त मुझे मर मर कर जीना था और उसकी शादी के तुरंत बाद इस देह की ईहलीला समाप्त करनी है ,  सो आज कर रही हूँ |  संजीव का मानसिक संतुलन बिगड़ चूका है वो मुझे माफ़ नहीं कर सकता ,  अतुल मुझे कभी माफ करेगा नहीं और रोहित मर चुका है उससे मैं माफ़ी मांग नहीं सकती | इनके परिवार मुझे कभी माफ नहीं करेंगे |  मैं माफ़ी मांगना चाहती हूँ हरीश जी सिर्फ आप से ,  मैं आपका साथ बीच में छोड़ कर जा रही हूँ |  जो डर मेरे साथ पैदा हुआ था, आज उसे यहीं छोड़े जा रही हूँ , हो सके तो उसे ढूंढना और किसी पिंजरे में बंद करके जमीन की गहराई में गाड़ देना ताकि कोई और इसके वश में होकर किसी के आंसुओं का कारण न बन जाय … 

                                अलविदा 

                                               आपकी जया

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