● इंतजार ●

“ये दारू की बू ..सिगरेट की बास ..तूँ दारू पीने लगा है क्या फ़िरोज़ ….अल्लाह ..ये चोट कैसे लगी ?” सलमा ने घर में घुसते ही आगे के कमरे में बैठे अपने बेटे फ़िरोज़ पर सवालों की बौछार कर दी थी जिसके सिर से लहू बह कर चेहरे पर आ गया था | आज तीन साल बाद फिरोज ने अपनी अम्मी की आवाज सुनी थी |

सलमा का शौहर मकबूल मियां दस साल पहले अपने छः शराबी दोस्तों के साथ मुम्बई घूमने गया था और वहां लापता हो गया था | दोस्तों ने बताया कि भीड़ भरी एक सड़क पार करते समय वो बिछड़ गया जो ढूंढे नहीं मिला | मकबूल मियां का पूरा नाम मोहम्मद मकबूल अली था पर उसे मकबूल मियां नाम से ही बेहतर जाना जाता था | शुबह उठते ही दारू पीना शुरू करता था जो पूरे दिन चलती थी | कोई दिन ऐसा नहीं होता था जब दारू के नशे में उसके गुस्से का कहर उसकी बीवी सलमा पर बरपा न हो | सलमा बिना किसी गलती रोज़ाना लातों घूंसों से पिटती थी लेकिन उसे विश्वास था कि एक दिन जब मकबूल मियां दारू छोड़ देगा तो जरूर पहले जैसा प्यारा और मासूम इंसान बन जायेगा |

मकबूल का लिवर खराब हो चुका था और डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि दारू नहीं छोड़ी तो यह कुछ महीनों का मेहमान है | मकबूल सरकारी महकमें में चपरासी था लेकिन सारी तनख्वाह दारू में ही उड़ा देता था | सलमा सिलाई का काम जानती थी और उसी से न सिर्फ वो घर चलाती थी बल्कि मक़बूल के ईलाज का खर्च भी उठाती थी |

जब वो लापता हुआ था तब भी नशे में धुत था | पूरे एक साल तक सलमा हर महीने मुम्बई जा जाकर अँधेरी पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाती रही | अंत में पुलिस ने भी उसकी फाइल बन्द कर दी , उनका कहना था कि वो दारू के नशे में किसी लोकल बस में बैठ गया होगा और बीमारी और कमजोरी के चलते कहीं मर गया होगा तो लावारिश समझ कर उसकी लाश दफना दी गई होगी | फिर भी कभी कुछ पता चला तो उसे उसके घर के पते पर सुचना कर दी जायेगी इसलिये दुबारा न आये | लेकिन सलमा की उम्मीद नहीं छूटी थी | वो हमेशा उसके लौट आने की उम्मीद में ही जिन्दा थी |

तीन साल पहले मक़बूल को गुम हुये सात साल बीत गए थे तब सलमा के भाई हमीद ने उसे मृत घोषित करवाने की क़ानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी थी ताकि उसके बेटे फिरोज को मृतक सरकारी कर्मचारी का आश्रित मानकर सरकारी नौकरी मिल सके |

सलमा अपने बेटे और भाई के इस फैसले से बिलकुल खुश नहीं थी | उसकी उम्मीद अभी खतम नहीं हुई थी | लेकिन फिर भी क़ानूनी तौर पर मक़बूल का मृत्यु प्रमाण पत्र भी बना और फिरोज ने सरकारी महकमें में एलडीसी की नौकरी भी हासिल कर ली | सलमा जो पहले ही बुझी बुझी रहती थी उसने अब बिलकुल भी बोलना बन्द कर दिया था | पिछले साल फिरोज का निकाह परवीन से हो गया था लेकिन सलमा एक मशीन की तरह ही रही | उसने आज तक कभी परवीन से भी बात तक नहीं की थी | उसे फिरोज अपनी उम्मीदों के क़ातिल की तरह लगता था | उसके ठंडे और बोझिल से बर्ताव से फिरोज और परवीन दोनों परेशान थे |

“नहीं नहीं अम्मी .. अब्बू आ गये हैं ..” फिरोज ने बताया

“अल्लाह … मक़बूल आ गया.. कहाँ है वो ..” सलमा के चेहरे पर नूर आ गया था

” वो बहुत नशे में थे अम्मी और हम सब पर बहुत गुस्से में थे ..वो कह रहे थे कि हमने जालसाजी करके उनकी नौकरी हथिया ली है ..उन्होंने ही गुस्से में लोहे के डंडे से मेरा सिर फोड़ दिया ….” फिरोज अपनी बात का असर सलमा के चेहरे पर देखने को एक पल रुका उसने देखा सलमा का जोश ठंडा पड़ गया था

“… उनके साथ एक औरत और बच्चा भी था जिसे वो अपने बीवी बच्चे बता रहे थे .. वो पांच लाख रुपये मांग रहे थे उन्होंने धमकी दी थी कि नहीं तो वो पुलिस में हमारे खिलाफ रिपोर्ट करेंगे और सब को जेल करवा देंगे ..” अपनी बात पूरी करते हुए उसने देखा कि सलमा के चेहरे पर कठोरता आ गई थी

“तो तुमने क्या कहा ..?” सलमा का लहजा सख्त था

“म..मैं क्या कहता ..? उन्होंने कहा है कि वो सराय में ठहरे हैं आज की तारीख में पैसे नहीं दिए तो अपने बीवी बच्चे सहित यहीं आकर रहेंगे और पुलिस में शिकायत कर के हमें गिरफ्तार करवा देंगे …मेरी तो नौकरी भी चली जायेगी अम्मी ..” फिरोज रुआंसा सा बोला |

“इतने पैसे कहाँ से आएंगे ..” सलमा अब चिंतित थी

“हमीद मामू ने कहा है कि वो उधार दिलवा देंगे ..”

“हमीद भी यहीं था तब ..?”

“हाँ ..वो पैसों की व्यवस्था करने गए हैं ..मैं आपका ही इंतज़ार कर रहा था .. आप अब्बू से मिलना भी चाहती थी ..चलिये मिल भी लीजियेगा और पैसे भी देंदेंगे ..मामू इंतजार कर रहे होंगे ..”

” नहीं फिरोज ..मुझे उसकी शक्ल भी नहीं देखनी ..तुम ही जाओ और उस नामुराद को दफा करके ही आना ..” सलमा ने फैसला कर लिया था | फिरोज ने भी ज्यादा जोर नहीं दिया और तेज कदमों से तुरन्त निकल गया |

इस घटना को आज एक महीना हो गया था | सलमा अब सामान्य हो चुकी थी | मक़बूल के जिक्र से ही वो नफरत से भर उठती थी | फिरोज अपनी बीवी परवीन और मामू हमीद के साथ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ0 बेनीवाल को शुक्रिया कहने उनके क्लिनिक में आए हुए थे |

“डॉक्टर साहब आपकी सलाह से मैंने अब्बू के लिये अम्मी के दिल में नफरत पैदा कर दी और अल्लाह का शुक्र है कि वो अब ठीक है ..लेकिन एक बात आज तक नहीं समझ आई कि अब्बू की इतनी गाली गलौच, मारपीट और ज़िल्लत के बावजूद अम्मी उन्हें आज तक मुहब्बत क्यों करती थी ..?”

“इंसानी दिमाग और भावनाओं की गुथियां आज भी अनसुलझी है बरखुरदार ..किसी एक की मुहब्बत बदले में दूसरे की मुहब्बत की मोहताज नहीं होती ..तुम्हारी अम्मी ठीक हो गई .. हो सकता है न भी होती ..अपनी औलाद का बुरा चाहने वाले से कोई औरत नफरत ही कर सकती है ऊपर से तुमने दूसरी औरत का तड़का और लगा दिया .. लेकिन एक बात बताओ अगर तुम्हारी अम्मी तुम्हारे अब्बु से मिलने को साथ चल देती तब क्या करते ..?” डॉ0 बेनीवाल ने फिरोज से पूछा

” तब मैं हमीद मामू को फोन कर देता और ये तुरन्त आकर बता देते कि अब्बु को पैसे देकर उन्होंने ट्रेन में बिठाकर उनके बीवी बच्चे सहित रवाना कर दिया है ..”

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