● आदर्श ●

“….इसके अलावा पुण्डरीक के परिवार में किसी एक सदस्य को मिल में नौकरी देनी होगी ..उसके लिये आजीवन पेंशन और साथ ही उसे और उसकी पत्नी को मेडिकल की सुविधा ..मिल के सब कर्मचारियों के लिये पेंशन फंड …”  

“मुद्दे की बात करो दीनदयाल सिंह ..”  सेठ जानकीदास ने यूनियन लीडर के ज्ञापन को हवा में उछालते हुए उसकी बात बीच में काट दी , उनके चेहरे पर अर्थपूर्ण मुस्कान थी |   दीनदयाल सिंह ने अपने साथ आए यूनियन सचिव हरि पांडे की ओर विजयी नेत्रों से देखा | हरि पांडे की दाढ़ी से छुपे चेहरे पर मोटे ग्लास के चश्मे के पीछे आँखों में चमक पैदा हो गई थी |  

” पांच लाख ..” हाथ का पंजा दिखाते हुए वो सेठ जी से मुखातिब हुआ    “..दो दो लाख हमारे और एक लाख यूनियन फंड में ”

“एक लाख ..” सेठ जी ने बोली लगाई 

“तीन ..” 

“दो लाख फाइनल ..चाहे जैसे बाँट लेना ..”  कहते हुए उन्होंने अपनी मेज की ड्रॉअर से निकाल कर नोटों की गड्डियां उनके सामने डाल दी .. दीनदयाल एक क्षण झिझका उसकी हरि पाण्डे से आँखों आँखों में कुछ बात हुई और उसने रूपये उठा लिए |  

“ठीक है सेठ जी ..कल से हड़ताल खतम…” 

“कल नहीं आज और अभी सब वर्कर काम पर लौटने चाहिये  ..और एक बात.. जर्मन कम्पनी के इस मिल को मिले ऑर्डर की सुचना तुम्हे किसने दी थी ..? ” सेठ जी का लहजा सख्त था 

“इन्होंने ..”  वो ख़ंजर की तरह अपनी तर्जनी वहीं बैठे अजय श्रीवास्तव की तरफ करते हुए बेधड़क बोला |  अजय श्रीवास्तव सन्नाटे में आ चुका था | 

“ठीक है  सेठ जी ”  खींसे निपोरते हुए दीनदयाल सिंह दोनों हाथों में नोटों की पोटली अपने अंगोछे में लपेट कर हरि पांडे के साथ कूच कर गया |  पीछे छूट गए थे सन्नाटे में लिपटे विजय श्रीवास्तव और सेठ दीनदयाल | 

                    पिछले चार दिन से चल रही दूल डाउन हड़ताल का समापन हो चला था |  सेठ जी की अनुपस्थिति में एक वर्कर पुण्डरीक का हाथ मशीन में आकर कट गया था | मिल के जनरल मैनेजर अजय श्रीवास्तव ने मिल के नॉर्म्स के आधार पर उसका पूरा इलाज मिल के खर्चे पर करवाने और दो लाख की क्षतिपूर्ति की घोषणा कर दी थी लेकिन यूनियन लीडर दस लाख के हर्जाने और आजीवन पेंशन की मांग पर अड़ गए |  पिछले चार दिवस में मजदूरों का क्रोध भी बढ़ता गया और मांगे भी |  सेठ जी विदेश यात्रा से आज ही लौटे थेऔर लौटते ही उन्होंने यूनियन लीडर से अपने चेम्बर में मीटिंग फिक्स की थी |  

                      इस पूरी मीटिंग के दौरान  अजय श्रीवास्तव एक मूक दर्शक की तरह बैठा रहा  |  वो पिछले सात साल से इस मिल में मुलाजिम था |  सात साल पहले जब वो इंजीनियरिंग की  डिग्री और एमबीए करने के बाद इस मिल में लगा था तब उसे असिस्टेंट मैनेजर के पद पर रखा गया था |  उसे तब सेठ जी ने हमेशा लगन ईमानदारी और आदर्शों पर चलने  को ताकीद  किया था |   अपनी ईमानदारी और कड़ी मेहनत के बल पर वो मात्र सात ही साल में मिल का जनरल मैनेजर बन गया था |  लेकिन अब तक ऐसी कोई दुर्घटना कभी नहीं हुई थी |   

                       उस दिन अस्पताल में पुण्डरीक की हालत देखकर उसका दिल भर आया था |  उसके छोटे छोटे बच्चों को देखकर उसे दो लाख का हर्जाना नाकाफी लगा था और उसने सेठ जानकीदास को दस लाख का हर्जाना और पेंशन देने की बात फोन पर कही थी जिसे सेठ जी ने तुरंत मना कर दिया था और तब भारी मन से उसी ने ख़ुफ़िया तरीके से यूनियन लीडर को बुलाकर संघर्ष करने का सुझाव दिया था |  उसे पता था कि उस समय मिल जबर्दस्त मुनाफे में चल रही थी और विदेशों से आए ऑर्डर्स की समय पर आपूर्ति करने के लिये सेठ जी को झुकना पड़ेगा |  

“क्यों किया ऐसा ?” सेठ जी अजय की तरफ आग्नेय नेत्रों से देख कर सन्नाटे को तोड़ते हुए बोले  |  अजय की हालत ऐसी थी जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई थी ..उसे कुछ क्षण लगे अपनी हालत सुधारने में फिर वो हिम्मत बटोर कर बोला 

” सेठ जी ..आपने ही कहा था वर्कर्स के साथ सह्रदयता और ईमानदारी के साथ काम करना ..और मैंने वही करने का प्रयास किया किन्तु आप … आपने खुद को हमेशा आदर्शवादी बताया ..यह है आपकी आदर्शवादिता ..छी ..आज आप ने अपनी सारी पोल खुद मेरे सामने खोल दी है ..मैं आपकी नौकरी से इस्तीफा देता हूँ ..”  कहते कहते अजय उठ कर खड़ा हो गया 

” इस्तीफा तो तुम्हे देना ही होगा अजय वरना बर्खास्त कर दिए जाओगे ..जाते जाते मेरी एक बात सुनते जाओ ..आदर्श और ईमानदारी उस परिवार के मुखिया की संदिग्ध नहीं होती जो अपने परिवार के सदस्यों की नाजायज मांगे मांगने से इंकार कर दे ..लेकिन तुमने जो किया उसे विश्वासघात कहते हैं बरखुरदार ..”  

” विश्वासघात है तो यही सही ..पर आज यूनियन लीडर्स को पैसे के बल पर खरीदते हुए मैंने आपको देखा है ..इतनी ज्यादा गिरी हुई हरकत की मुझे आपसे उम्मीद नहीं थी …” 

“तुम मिल से मिली हुई अपनी आलीशन कोठी लग्जरी कार और मिल से मिलने वाले लाखों के पैकेज पर थोड़ा गौर करना   मि0 श्रीवास्तव .. और सोचना कि यह सब जो तुम्हे मुहैया है वो मिल मजदूरों को  क्यों नहीं ?  तुम उस बच्चे की तरह हो अजय जिसे कबाब चिकन बिरियानी खूब पसंद है लेकिन जिसने कभी कटते हुए जानवर को नहीं देखा .. जब कभी वो पहली बार किसी जानवर को कटते हुए देखता है तो उसकी तड़प और बहता हुआ लहू देखकर उसका मन वितृष्णा से भर उठता है ..उसे वो गिरी हुई हरकत ही लगती है ..  और वो उस घड़ी मन में तय करता है कि अब कभी मांस नहीं खाएगा ..लेकिन यह वक्ती भावुकता ही होती है .तुमने भी आज एक जानवर को कटते हुए देख लिया है ..एक बात ध्यान रखना ..किसी जानवर के कटे बगैर तुम्हारी प्लेट में मांस का टुकड़ा  आना  असम्भव है .. नाऊ गेट लॉस्ट ..”

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