● आंसू ●

वो दीवाली का दिन था | 

               पिछले दो दिन और एक रात  मेहनत करके उसने वो लकड़ी का दरवाजा बनाया था | सामान्यतया वो भी अमावस्या की छुट्टी ही रखता था लेकिन एक तो सेठ श्रीनाथ जी की पुत्र वधु ने कहा था कि ऊपर से बिल्ली आ जाती है इस लिए सीढ़ियों का यह दरवाजा दीवाली तक हर हाल में बन जाना चाहिए और दूसरा उसे दीवाली को रुपयों की सख्त जरूरत थी | 

           उसके हालात पिछले कईं बरसों से ही खराब चल रहे थे | पिता के देहांत पश्चात सम्पति का बंटवारा हुआ था तब दोनों भाइयों का साँझा काम था और दोनों  की स्थिति एक सी ही थी पर  तब उसने बड़ा भाई होने के नाते  बड़प्पन दिखाते हुए पुश्तैनी सुथारी की दुकान छोटे भाई को दे दी थी और   तब से वह खुला काम करने लगा था | लेकिन उसे मिलने वाला काम धीरे धीरे कम होता गया क्योंकि पुराने ग्राहकों का काम दुकान पर ही आता था |  भाई ने पिछले दस साल में कई कामगार भी रख लिए थे और दुकान को छोटे से शो रूम का रूप दे दिया था | छोटा भाई पिछले साल से उसके पड़ौस का मकान खरीद कर वहाँ रहने लगा था इसी से उसकी समस्याएं बढ़ गई थी |  उसका बेटा नन्हा सा  गुल्लू जहां अब चचेरे भाई बहनों को देख देख कर कई फरमाइशें करने लगा था वहीं उसकी घरवाली जो शुरू से संतोषी प्रवृति की थी , अब असंतुष्ट रहने लगी थी |  कभी प्याज तोड़ कर उससे ही रोटी खाकर हंसी ख़ुशी रहने वाला उसका कुनबा अब पड़ौस से उठती लजीज भोजन की खुशबुओं से पीड़ित रहने लगा था | दीवाली के दिन लक्ष्मी पूजन के समय सौ डेढ़ सौ के थोड़े से पटाखे और फुलझड़ियां चला कर सगुन कर लेने वाले उसके कुटुंब की आँखे फ़टी रह गई जब दीवाली से तीन दिन पहले ही भाई के बच्चों ने हजारों रुपये के पटाखे छोड़ने शुरू कर दिए थे |  एक अनार वो ऐसी छोड़ते थे जो पांच दस मिनट तक अलग अलग रंग की रौशनी करती और अंत में भीषण आवाज के साथ फट जाती और एक टेलीफोन नुमा पटाखा जो दो कोनों से बंधी डोरी पर आगे पीछे चलता हुआ रौशनी छोड़ता था |  गुल्लू को इस दीवाली पर नए कपड़े चाहिए थे वो भी सिलेसिलाए वाले और घर वाली ने कहा था कि चमकी वाली जरी की साड़ी और नई मेमसाहब जैसी सैंडिल उसे लेनी जरूरी है नहीं तो देवरानी के सामने उसकी नाक ही कट जायेगी |  

                    उसके पास कुल जमा आठ हजार रुपये थे  और जब यह दरवाजा बनाने का काम मिला तो उसने सारे रूपये खर्च करके लकड़ी और जरुरी फिटिंग्स खरीद ली थी क्योंकि उस दरवाजे का सौदा बारह हजार में हुआ था और दीवाली वाले दिन काम पूरा होने पर भुगतान मिल जाने वाला था | 

               शाम के छः बजे होंगे जब उसने उस दरवाजे को अंतिम रूप दे दिया |  अब बस अपने बारह हजार लेकर गुल्लू और उसकी माँ को बाजार ले जाना था | उसने सोच रखा था कि इतने रुपयों में एक बार तो वो उनकी मन की पूरी करवा ही देगा |  

“भाभीजी गेट चेक  करलो पूरा कर दिया है ..” सीढ़ियों से नीचे आकर रंगोली बनवाती उस महिला से उसने कहा |  पूरा शरीर उस मौसम में भी पसीने से भीगा हुआ था और सांस किंचित चढ़ गई थी | पर वो खुश था क्योंकि काम समय पर जो पूरा हो गया था |  

“अरी कैसे मरे मरे हाथों से बना रही है , अभी कितना काम बाकी है जरा जल्दी से बना ..अभी तेरे सेठ जी आ जायेंगे तो फैक्ट्री जाना है मुझे उनके साथ पूजा के लिये ..” उसने रंगोली बनाती लड़की को डांट कर उसकी तरफ तरफ देखा 

“ठीक है ..” इतना कह कर वो फिर से से रंगोली बनवाने में व्यस्त हो गई 

“भाभीजी …वो पैसे मिल जाते ..” कुछ देर खड़ा रहकर उसने पुनः याद दिलाया 

“कल आना ..अभी जाओ ..बिलकुल फुरसत नहीं है ..”  वो हाथ के इशारे से उसे बाहर का रास्ता दिखाती बोली 

“अरे नहीं नहीं भाभीजी पैसे तो अभी ही चाहिए …”  उसका हलक सूख गया

“अच्छा ..!  अभी चाहिए ..चलो उतारो अपना गेट ..वापिस ले जाओ ..हमें नहीं चाहिए ..किसी और कारीगर से  से बनवा लेंगे जो  एक दिन का भरोसा कर सके”  वो आगबबूला हो उठी थी 

“जी ऐसी बात नहीं है ..बात ये है के ..” 

“चलो ..जाओ ..” भाभीजी कठोर मुखमुद्रा के साथ हाथ का इशारा मुख्य द्वार की ऒर किये खड़ी थी | वो भारी कदमों से वहाँ से निकल गया | 

               अपने घर के सामने खड़े होकर उसने कुर्ते की जेब टटोली तो कुल सत्रह रूपये थे | अब कैसे सामना करेगा गुल्लू का और उसकी माँ का |  वो वापिस घूम गया और कितनी ही देर बेवजह इधर उधर भटकता  रहा | उसका दिमाग सुन्न था |  पटाखों की आवाज उसके दिल पर चोट कर रही थी |  रात के तकरीबन दस बजे भारी दिल के साथ वो वापिस घर पहुंचा | 

“अरे आज गुल्लू का हाथ फटाके से जल गया था ..” उसे अंदर घुसते ही पत्नी की आवाज सुनाई दी |  यह सुनते ही  उसका दिल पसलियों में जोरदार टक्कर मार गया 

“क..कैसे ..?  उसे पटाखे किस ने दिए ..? कितना जला है ..? अस्पताल में दिखाया क्या ..?  कहाँ है ..गुल्लू कहाँ है ..? ”  उसका कलेजा मुँह को आ रहा था 

“अजी गली के बच्चे फटाके छोड़ रहे थे तो उनका एक टेलीफोन फिसकी निकल गया …फैंका हुआ वो टेलीफोन ये घर में ले आया और डोरी बांध कर कब चलाने लगा मुझे पता न चला ..वो टेलीफोन इसके हाथ में फूट गया ..अपस्ताल दिखा लाई.. डाक्टर बाबू ने कहा है कि मामूली जलन है ठीक हो जावेगी ..” 

वो तेजी से घर के अंदर आंगन की तरफ घुसा |  उसका ग्यारह  साल का बेटा गुल्लू आंगन में मुंह फुलाए बैठा था ..उसके बाएं हाथ में पट्टी बंधी थी ..उसके सामने थाली परोसी हुई थी जिसमें सब्जी रोटी थी ..जिसे उसने छुआ भी नहीं था ..उसे आज मिठाई खानी थी और नए कपड़े पहनने थे |  उसका दिल भर आया और वो गुल्लू का पट्टी वाला हाथ अपने हाथ में लेकर मायूस नज़र से उसे देखता रहा |  

“बापू ..मैंने आज टेलीफोन छोड़ा ..”  गुल्लू उसकी आँखों में देखकर अचानक हंसता हुआ बोला ..”मुझे  दर्द बिलकुल नहीं हो रहा है ..और मुझे नये  कपड़े तो बिलकुल नहीं चाहिये अगले..साल ले लूंगा …और माँ ने सब्जी बहोत बढ़िया बनाई है ”  उसने थाली उठा ली थी  “स्कूल में मास्टर जी ने बताया कि मिठाई खाने से पेट में कीड़े हो जाते हैं ..” वो रोटी का कौर तोड़ कर मुंह में रखता हुआ बोला |  उसका बेटा छोटीसी उम्र में इतना बड़ा हो गया था कि बाप की मजबूरी उसकी आँखों में पढ़ ली |  लेकिन “वो” अपने आंसू नहीं रोक पाया था , आँखों से निकलता पानी जैसे हवेलियाँ बहा ले जाने को आमादा था |

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