●दृष्टि●

वो गर्मियों का एक उमस भरा दिन था | 

पंकज रेलमार्ग से भटिंडा जा रहा था और वहां से आगे अमृतसर के लिये बस से यात्रा करनी थी | ट्रेन लगभग डेढ़ घण्टा देरी से रवाना हुई थी | गर्मी और उमस से वो मरा जा रहा था |  वो इस डेढ़ घण्टे में  प्लेटफार्म पर  दो जनों से “चटी” कर चुका था | चटी का आशय झगड़ा करने से है पर इस का यह सही अनुवाद नहीं होगा क्योंकि इसका बीकानेरी भावार्थ है बिना बात झगड़ा करना और सामने वाले का दिमाग चाट जाना | अब उसे  रामसुख मिल गया था | वो भी सॉफ्टवेयर इंजीनीयर था और कभी दोनों एक साथ काम कर चुके थे | वो भी भटिंडा ही जा रहा था | प्रभुकृपा से श्रोता अच्छा मिल गया था तो वह अब आलोचक की मुद्रा में आ गया  | उसने रेलवे डिपार्टमेंट की व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाए , कर्मचारियों को निकम्मा बताते हुए रेल मंत्री तक को कमीशनखोर बता दिया , प्लेटफॉर्म की सफाई व्यवस्था से लेकर कुलियों और ठेलेवोलों तक को कोसा  “…अरे भाई यह तो  रेलगाड़ी के डिब्बों का रंग तक नहीं बदल पाए , आज भी उन्हीं रंगों  से डिब्बे पोतते हैं जिनसे अंग्रेजों के जमाने में  पुताई होती थी … वही पकाऊ रंग .. अंदर का इंटीरियर भी वो ही ..वो ही लम्बी बेंचनुमा सीटे .. साला कोई  इनोवेशन नहीं.   गाँधी फिल्म देख ले .. ..”  

                    ट्रेन रवाना हो चुकी थी |  पंकज उमस की मार से अभी भी बेहाल था |  सामने की सीट पर एक मियाँ जी अपनी बीवी और छोटी सी पोती के साथ बैठे थे | उनके साथ ही एक ठाकुर साहब बैठे थे | उनका बहु बेटे और बच्चों का परिवार भी साथ था और वे साइड सीटों पर और कुछ पास के कम्पार्टमेंट में बैठे थे | 

“अब ये नई चिक चिक शुरू होने वाली है ..” वो धीरे स्वर में रामसुख को कह रहा था  “..कुत्तों की तरह लडेंगे साले  ..हिन्दू Ssss हिन्दू Ssss मुसलमान Ssss मुसलमान Sssss  भौं भौं भौं ”  कुत्ते के भौकने की आवाज भारी  गले से निकालता  हुआ बोला |  रामसुख एक अच्छे श्रोता के गुणधर्म से युक्त सिद्ध होता हुआ धीरे धीरे सहमतिसूचक गर्दन हिला रहा था |     

               रात पड़ चुकी थी | दोनों परिवार खाने के डिब्बे खोल चुके थे | मियां जी की नन्ही पोती को अचार नहीं मिलने से वो मुँह फुलाए बैठी तो ठाकुर साहब ने उसे गोद में लेकर अपने साथ खाने के लिए मना लिया था | ठाकुर साहब की प्लेट में मियाँ जी जबरिया जलेबियाँ टिका आए थे और उधर से बेसन के परांठे ले आए थे | पुरे कूपे में मिठाई भुजिया और सब्जियों की खुशबु तैर रही थी | पंकज रास्ते के लिए कुछ केले और कचौड़ियाँ अपने बैग में लेकर चढ़ा था,  पर वहाँ खुले छप्पन भोग के सामने उसने अपनी खाद्य सामग्री नहीं निकाली जिसका कुल जमा फायदा यह हुआ कि एक तो वह हीन भावना से ग्रसित होने से बच गया  दूसरे मियाँ जी और ठाकुर साहब को ओब्लाइज करते हुए छक कर भोग लगाया | बीच में एक स्टेशन पर पंकज  ठाकुर साहब के पानी के कैम्पर में ठंडा पानी भर लाया था |  रामसुख भी पूर्णतृप्त हुआ था |  

“कहाँ से हो , बीकानेर के तो नहीं लगते ..” मियाँ जी पोपला मुँह चलाते हुए पंकज से मुखातिब थे 

“जी दिल्ली से हूँ , सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, कम्पनी के काम से बीकानेर आया था , अब भटिंडा होकर अमृतसर जाऊंगा” पंकज की भाषा में मिठास और संतुलन देखकर रामसुख हैरान हो रहा था 

” जी , एक बात पूछूँ तो  आप लोग  नाराज मत होना  ..” पंकज ठाकुर साहब और मियाँ जी की तरफ देखता हुआ बोला “.. आप लोगों में आपस में बड़ा प्यार है…मेरा मतलब है ..बैर नहीं ”  वो कुछ अटकता सा बोला .. मियाँ जी और ठाकुर साहब उस का मन्तव्य समझ कर मुस्कुरा रहे थे | जवाब में ठाकुर साहब ने गला साफ कर तरन्नुम में अज़ीज आज़ाद साहब की गजल सुनाई 

“….तुम हो ख़ंजर भी तो सीने में समा लेंगे तुम्हें

पर ज़रा प्यार से बाँहों में तो भर कर देखो

मेरा दावा है कि सब ज़हर उतर जायेगा

तुम मेरे शहर में दो दिन तो ठहर कर देखो ..” 

                 ट्रेन अँधेरे को चीरती हुई दौड़े जा रही थी | 

अब पंकज को उमस परेशान नहीं कर रही थी |    श्रोताश्री रामसुख सुनता जा  रहा था “अरे भाई ये जापानी ये अंग्रेज ये आस्ट्रेलियन अपनी मुट्ठी भर जनसंख्या की ट्रांस्पोर्टेशन में रोज एक्सीडेंट करवाते हैं  हिंदुस्तान की जनसंख्या है 125 करोड़ .. ..और भारतीय रेलवे  इतने बड़े यात्री भार के साथ मकड़ी के जालों जैसी ट्रेक पर दौड़ती ट्रेनों को अधिकतम सुरक्षा के साथ ऑपरेट कर रहे हैं .. कोई मजाक है क्या  ..और यह सब सम्भव होता है अच्छे स्टाफ, प्रशासन,  इंजीनीयरिंग  और  राजनैतिक  दृढ  इच्छा  शक्ति  की वजह से …” पंकज की दृष्टि भी बदल चुकी थी और दृष्टिकोण भी  |

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