●कूलर काण्ड●

यह 2010 की गर्मियों का एक आम सा दिन था |
सेठिया जी मेरे निवास पर जन्मपत्री दिखाने आए हुए थे | मैं मनन कर रहा था .. शनि मंगल और चन्द्रमाँ का दान करवाना है .. वायु तत्व प्रमुख हो ..

“एक काम करो सेठिया जी एक एयर कूलर का दान करो .. और किसी ऐसी जगह करना जहाँ इसकी अधिकतम जरूरत हो ” मैंने  उन्हें ज्योतिषीय  सलाह दी | 

सेठिया जी परोपकारी व्यक्ति हैं |  रामदेवरा मेले पर पैदल यात्रीयों के लिए ट्रक भर कर सेवा सामग्री प्रतिवर्ष भेजते हैं | धर्मभीरु भी हैं और संवेदनशील   भी  | 

“आप ही कोई जरूरतमंद व्यक्ति बता दीजिए ..मैं भिजवा देता हूँ ” सेठिया जी ने सहजता से कहा 

“आप एक काम कीजिए ..इस बार किसी अस्पताल में कूलर दीजिए ..”  मेरा ज्योतिषीय दिमाग चल रहा था 

“पीबीएम में दे दें ??” सेठिया जी ने प्रस्ताव रखा 

“अरे पीबीएम में तो बहुत दान दाता आते रहते होंगे किसी दूसरी छोटी अस्पताल या डिस्पेंसरी में दीजिए वहाँ ज्यादा जरूरत रहती होगी” मैंने कुछ सोच कर कहा |  

“तो ठीक है मेरी नजर में एक सरकारी अस्पताल है चलिए अभी पता करते हैं वहां जरूरत है क्या |” सेठिया जी ने उत्साह के साथ कहा |  उनके उत्साह को देख कर मुझे बड़ा आनंद हुआ |  इस घोर कलयुग में ऐसे दानवीरों के पराक्रम से ही धरती अभी अपनी धुरी पर घूम रही है |  अगले आधे घण्टे में ही हम उनके बताए अस्पताल के अधीक्षक के कमरे में थे | कूलरों की संख्या रास्ते भर में ही सेठिया जी ने 1 से बढ़ाकर 5 करदी थी |  

“अरे साहब पेशेन्ट गर्मी से त्राहि त्राहि कर रहे हैं ..” अधीक्षक महोदय के चेहरे से अपने मरीजों के प्रति सम्वेदनाएँ जैसे टपक रही थी “..अब आप जब दे ही रहे हो तो कम से कम 10 कूलर दो तो आनंद आ जाए ..इससे कम तो समस्या मिटेगी ही नहीं …”  मुझे उनकी शक्ल पर एक क्षण के लिए लोलुप मुस्कान नज़र आई  “…और आप के तो कोई फर्क पड़ेगा नहीं  मरीजों की बड़ी सुविधा हो जाएगी  ” उन्होंने अपना वक्तव्य पूर्ण किया | 

“देखो डॉक्टर साब ..” मैंने हस्तक्षेप करते हुए कहा    ” ..हम यहाँ पर पाँच कूलर देने की बात करने आए हैं आप उतनी ही बात कीजिए ” मुझे रोष उत्पन्न हो  रहा था | 

“अरे कोई बात नहीं व्यास जी ..”  सेठिया जी मुझे टोकते हुए बोले “..अगर इनका काम 10 कूलर के बिना निकल ही  नहीं सकता तो हम  10 दे देंगे ..ये कौनसा अपने घर में लगवा रहे हैं , काम तो मरीजों के ही आने हैं  ,  आप कहते भी हैं ना अधिकस्य अधिकम् फलम्”  सेठिया जी लिजलिजे भावुक भाव में आ चुके थे यही वो भाव होता है जिसकी उस गर्म हुए लोहे से तुलना की जा सकती है जो हथौड़ा मार कर मोड़ने के लिए अनुकूलतम होता है |  ऋषि मुनि तपस्या के समय देवताओं के इसी भाव में आने का इंतजार करते थे | 10 कूलर देने का निर्णय हुआ और वो दिन भी निर्धारित हुआ जब दिए जाने थे | 

                           मई के महीने की उस दोपहर  में मैं सेठिया जी की कार से टेक लगाए खड़ा देख रहा था |  10 कूलर एक के ऊपर एक इस तरह से लगाए गए थे कि फोटो में एक साथ आ जाए  |  एक फोटो अधीक्षक साहब ,मेरे और पार्श्व में कूलरों के साथ खिंचवाने के बाद सेठिया जी उपेक्षित से किनारे खड़े थे |  अब अधीक्षक साहब अपने स्टाफ के साथ अलग ग्रुपों में फोटो शूट करवा रहे थे | मुझे राजा महाराजाओं के वो फोटो याद आ रहे थे जिसमें वो कन्धे पर बन्दूक रख कर जंगली जानवरों की लाशों पर पैर रखे खड़े दिखते हैं |  किसी ने बताया कि शिकार के बाद फोटोग्राफ के लिए ही वो जाया करते थे |  बहरहाल लेखाकर्मी होने के कारण मैंने जिद कर रखी थी कि इनका स्थाई स्टॉक पंजिका में इन्द्राज किया जाय |  अधीक्षक साहब मुश्किल से माने और  इन्द्राज करवा कर  हमने विदा ली | 

                       मरीजों की सुविधा कितनी हुई पता नहीं पर इस दिन के बाद जो आगे घटनाएं हुई उनसे सेठिया जी ने रहती जिंदगी में इस तरह के दान से तौबा कर ली और मैंने ऐसी सलाह फिर किसी को नहीं दी ..
                  ●सेठिया जी मुदित थे |  डॉक्टर साहब ने स्पेशल रिक्वेस्ट कर बुलाया था |  मैं उनके साथ था |  चाय की चुस्कियों के साथ हम डॉक्टर साहब की वाह वाही के हकदार बन रहे थे |  

“.. पर अब एक समस्या खड़ी हो गई है ..” डॉक्टर साहब अब उस बिंदु पर आ रहे थे जिसके लिए उन्होंने बुलाया था |  “..मरीजों को खड़े कूलर दिख रहे हैं पर हमारे पास पानी भरने के लिए स्टाफ नहीं है , आपने तो पूण्य कमा लिया और हमें छोड़ दिया मरीजों की गालियां खाने को ..”  कहते हुए वो हो हो कर हंस  दिए | मुझे फिर रोष उत्पन्न हो रहा था  | 

” तो हम आ जाया करें यहां पानी भरने ?”  मेरी वाणी में कुछ कटुता आ गई थी | 

“अरे व्यासजी आप मेरी बात को समझे नहीं ”

“आप समझा दीजिए ..”

“हमारे यहां साइकिल स्टैंड का ठेकेदार है ..” वो कुछ आगे की तरफ झुक कर राजदाराना अंदाज में बोले 

“..उससे बात कीजिए , उसके पास दो तीन आदमी है वो दिन में दो बार कूलर भरवा देगा , बस..  कुछ चुग्गा फैंक दीजिए ” अंगूठे को तर्जनी से जोड़ कर एक आँख दबाते हुए उन्होंने जैसे रहस्य खोला | 

” यह काम आप ही क्यों नहीं कर लेते ?” मैंने कहा 

” अरे पैसे कहाँ से दें ? हमारे पास बजट थोड़े ही है” 

” बजट रजिस्टर दिखाइए ” 

” अरे क्या आप भी .. अरे कूलर भरवाने के पैसे हम कैसे खर्च सकते हैं भला ..” 

” जीएफ एंड आर की एस ओ पी के अनुसार  बीइंग हेड ऑफ़ ऑफिस आप अनस्किल्ड लेबर को पेमेंट कर सकते हैं ,  मंगाइए बताता हूँ ” 

“आप मुझे कानून मत सिखाइये ” अब वो गर्म हो उठे 

” अरे छोड़िये व्यास जी ..” सेठिया जी ने बात को सम्हाला 

“..इतने पैसे जब लगा ही चुके हैं तो थोड़े बहुत और सही , बुलाइए डॉक्टर साब .. आप ठेकेदार को बुलाइए ”  सेठिया जी मेरे घुटनों पर अपने हाथ का दबाव बनाते हुए बोले | डॉक्टर साहब ने जैसे जादू के जोर से कुछ ही मिनटों में ठेकेदार को हमारे सामने खड़ा कर दिया | वो हट्टाकट्टा काला सा आदमी था जो लगातार मुँह में भरे गुटखे को चबाता हुआ दाएं से बाएं शिफ्ट किये जा रहा था |  मुझे कुछ मदिरापान का भी अन्देशा हुआ | ” साहब मई का महीना चल रहा है अगस्त तक का ठेका दे दीजिए ..” वो काफी कुछ गणित किये बैठा था | “.. चार महीनो के आठ हजार दे दीजिए ..फिर आप फ्री ..” कुछ झूमता सा वो बोला 

“आठ हजार !  ..तुम दारू पिए हो क्या ..?” मुझ से रहा नहीं गया  | 

“हा SSSSS…” वो दरियाई घोड़े सा अपना मुँह फाड़ के मेरे बिल्कुल सामने खड़ा हो गया था , मेरे अंदर पिंजरे में बन्द वाइल्ड चाइल्ड जैसे उछल कर खड़ा हो गया जिसे मैंने जैसे तैसे समझाया | 

“सूंघ लो साहब एक बून्द भी पी हो तो ” मेरी हड़बड़ाहट देख कर वो मुँह फाड़ के हंस रहा था | 

मामला पांच हजार में सेट हुआ | जिसका नकद भुगतान सेठिया जी ने कर दिया |  हम भारी कदमों से रवाना हुए | 

                      चार दिन आराम से निकले होंगे डॉक्टर साहब ने फिर  फोन कर दिया |  इस बार फिर सेठिया जी अपना धंधा व्यापार छोड़ डॉक्टर साहब की सेवा में गए |  संकोचवश इस बार उन्होंने मुझे नहीं बुलाया था | बाद में बताया कि डॉक्टर साहब थोड़ा गर्म हो रहे थे कि आप ने कूलरों में पानी भरने के लिए आदमी तो रख लिया पर उसे पानी भरने के लिए पाइप तो दिया ही नहीं |  ठेकेदार ने एक दिन भी पानी नहीं भरा है और इसमें उसकी कोई गलती भी नहीं है|  बिना पाइप वो पानी कैसे भरता |  आप को थोड़ा तो कॉमन सेन्स होना चाहिए |  सेठिया जी ने ठन्डे दिमाग से काम लिया और उनकी टूंटी से अंतिम कूलर तक की लंबाई का विशाल पाइप खुद ही बाजार से खरीद के दिया | 

यह बात मुझे उन्होंने तब बताई थी जब एक घटना और हो चुकी थी और उस ठण्डी मिट्टी के आदमी को क्रुद्ध मुद्रा में मैंने पहली बार देखा था .
                      ● उस दिन मैं अपने ऑफिस में था जब सेठिया जी का फोन आया |  उनकी व्यग्र आवाज के पीछे कुछ ऊंचे सुर में आवाजें आ रही थी | उन्होंने जैसे आर्तनाद सा किया और मुझे अस्पताल बुलाया |  मेरे सवालों का एक ही जवाब दिया कि आप अस्पताल पहुंचिए | 

मैं फौरन अस्पताल पहुँचा | अधीक्षक महोदय के कमरे में 5-7 लोग उपस्थित थे |  अधीक्षक महोदय जोरों से गरज रहे थे और सेठिया जी जैसे अपराध बोध में मुँह नीचा किये बैठे थे | मेरे अंदर प्रविष्ट होते ही उन्होंने जैसे पनाह मांगती आँखों से मेरी तरफ देखा | 

“.. पूरी अस्पताल में गंद फैला कर रख दी है आप लोगों ने ..”  अधीक्षक साहब अब मेरी तरफ आँखों से तीर भाले चलाते गरज रहे थे 

“क्या मतलब है आपका ..?  आप बताइये सेठिया जी क्या हो गया अब ?”  मैंने सेठिया जी से पूछा 

“पांच कूलर लीक हैं और वार्डों में पानी बिखर गया है ,  ऊपर से वो भी फोन नहीं उठा रहा जिससे ये कूलर हम ने लिये थे ”  सेठिया जी ने फंसे फंसे स्वर में कहा 

” तो एक बार कूलर बन्द करवा दो ” मैंने कहा 

” मरीजों के परिजन बन्द नहीं करने दे रहे और सफाईकर्मियों और परिजनों में कुछ कहासुनी भी हो गई है ..” सेठिया जी थूक गटक कर बोले 

“आप आ गये हो अब कोई टोटका करवाओ ” अधीक्षक साहब मुँह की एक कोर कानों के छोर तक खींच कर बोले | उनके व्यंग से मैं तिलमिला उठा | 

“चलिए दिखाइए कहाँ से लीक हैं ” मैं उठता हुआ बोला  

                    मैं सेठिया जी के साथ वार्ड में पहुंचा | पहले “लीक” कूलर को गौर से देखा तो पता चला की सारा पानी उसके गेट से बह रहा था | एक साइड गेट से नीचे की तरफ से नट गायब थे और इसी कारण वो गेट बाहर को निकला हुआ था | पानी पलंगों के नीचे तक जा चुका था पर अस्पताल स्टाफ या परिजनों ने इस मामूली बात को भी देखने की जहमत नहीं की थी |  बाकी के कूलरों में भी यही समस्या पाई गई | एक करोड़पति व्यापारी और एक राज्य सरकार का लेखाकर्मी दोनों मिलकर जुगाड़ में लगे थे पेचकश लेकर | दूसरे कूलरों से एक एक दो दो पेच निकाल कर इन कूलरों में कसे | पानी बहना बन्द हो गया था | अधीक्षक महोदय हमारे काम का “निरीक्षण’ कर गए थे |  मेरा गुस्सा सातवे आसमान पर पहुंच चूका था |  पसीने की टपकती हर एक बून्द मेरे अंदर के पिंजरे में बन्द वाइल्ड चाइल्ड को ललकार रही थी | वो पिंजरे पर लातें मार रहा था |  मैं ऑनड्यूटी सरकारी अधिकारी की तिक्का बोटी करने पर लगने वाली धाराएं उसे समझाता रहा और घूम घूम कर सारे कूलर ठीक करने में सेठिया जी का साथ देता रहा |  सेठिया जी का पारा भी चढ़ चूका   था | इसी दौरान उन्होंने मुझे पाइप वाली बात बताई थी | 

“उस झोपडी के कूलर वाले की दुकान कहाँ है ..? ” मेरे उस सवाल को शायद कुछ अनहोनी की आशंका में सेठिया जी ने होशियारी से बाईपास कर दिया था | 

सेठिया जी को मैंने सलाह दी की ड्राइवर साथ रखा करो |  मुझे चाय मंगवानी थी ,  जो हम बाहर थड़ी पर पीकर आये | उस मुश्किल घड़ी में मुझे उस थड़ी वाले के चेहरे पर नूर नजर आया | अधीक्षक से विदा ली तब उनके चेहरे पर कतई ग्लानि के भाव नहीं थे | उन्होंने खुद को काफी व्यस्त जाहिर करते हुए हमें फिर आने का कह कर हाथ मिलाते हुए  खींसे निपोरी | 

                 मैंने अस्पताल के बाहर पानी भरने वाले ठेकेदार को खड़ा देख कर सोचा कि पैसे दिए 15 दिन हो गए और पाइप दिए भी 10 दिन |  फिर यह लीकेज आज ही क्यों हुआ ?  फिर मैंने इस विचार को झटक दिया | 

             
                     ● अगले एक महीने में कई बार समस्याएं आई | कभी कूलर का पँखा आवाज कर मरीजों को डिस्टर्ब करता तो कभी पानी का पम्प खराब होता | कूलर विक्रेता को शायद फोन उठाना आता नहीं था |

सेठिया जी धंधा पानी छोड़ हर तीसरे दिन अस्पताल में फिरते नजर आते | अधीक्षक महोदय ने अपने स्टाफ में सेठिया जी के मोबाईल नम्बर बाँट दिये थे | कोई भी फोन खड़का देता |  सेठिया जी ने संकोचवश मुझे आने के लिए कहना तो बन्द कर दिया था पर मुझे फोन पर बता कर गम हल्का कर लिया करते थे | उनके एक सवाल का जवाब तो  मुझे ही देना बनता था ..

“व्यास जी ,  आपने ये कूलर का दान समस्या मिटाने के लिये करवाया था पर समस्या तो ये खुद हो बन गए, ऐसा क्यों हुआ ?” 

“आप ने फाइबर ग्लास के कूलर दे दिए जबकि मैंने लोहे के कहे थे,  लोहे का दान शनि का होता है , आप पूरी बात तो सुनते नहीं हो ,  और एक कूलर की बात थी आपने तो पूरा प्रोजेक्ट बना दिया ” मैं ने  उनको समझाया |

                    अगली सूचना यह आई की पाइप चोरी हो गया था | मैंने अधीक्षक की टेबल पर मुक्के बरसाए कि इसमें आप के आदमियों की ही मिलीभगत है | ठेकेदार ने खुद ही पाइप पार किया है |  उन्होंने ऍफ़ आई आर कराने से मना कर दिया | उनका कहना था कि एक तो यह आइटम हमें नहीं दिया गया था बल्कि आप ने “अपने” ठेकेदार को ही दिया था तो हमारे तो स्टॉक में तो यह है नहीं | रोते कलपते हमने दूसरा पाइप ठेकेदार को दिलाया और उसके एक ही सप्ताह बाद अधीक्षक महोदय का फोन पूरी शिद्दत के साथ आया | हम दोनों फिर उनकी हाजरी में थे |

“अरे तो आपको तो पता था कि उसका साईकिल स्टैंड का ठेका  30 जून तक ही है तो हमसे अगस्त तक के पैसे क्यों दिलवाए ?” मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस आदमी से कैसे निपटा जाए | मेरी कनपट्टियां तक सुलग रही थी | ठेकेदार भाग गया था | अधीक्षक महोदय कूलरों को स्टोर में पटकवाने का रास्ता बता रहे थे | सेठिया जी हर हाल में कूलर चलवाना चाहते थे | मेरा “वाइल्ड चाइल्ड” मुझ पर ठट्ठे मार कर हंस रहा था |  ठेकेदार का फोन नो रिप्लाई था और उसका घर हमें पता नहीं था और कोई रिकॉर्ड देखकर बताने को भी तैयार न था | अधीक्षक महोदय ने हमे “इस” प्रकार के आदमियों से ज्यादा फजीहत न करने की सलाह दी |

              

                  अधीक्षक महोदय के चाय पीने के आग्रह को ठुकरा कर हम बाहर थड़ी पर चाय पीने पहुंचे  | चाय पीते पीते मैंने देखा कि थड़ी वाला बाल्टी में पानी भरकर पेड़ों पर लटके पक्षीयों के लिए लटकाए गए परीन्डों में पानी डाल रहा था | मुझे पहली बार में उसके चेहरे पर जो नूर नजर आया था उसके कारणों की कुछ भनक लग गई |  मैंने कुछ सोच कर चाय पीते पीते उससे बात की और पूरी दास्तान संक्षिप्त में सुना दी | 

उससे हुई वार्ता से हमेंअसीम आनन्द प्राप्त हुआ –

“अरे साहब मैं तो यही था आप मुझे कह देते |  शुबह से दोपहर तक मैं रहता हूँ और शाम को मेरा लड़का रहता है , हम मिलजुल कर भर देते कूलर ..” 

“अब दो महीने तुम भर दो , पर देखो कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए , बताओ कितने पैसे लोगे ?”मैंने व्यग्र होकर पूछा 

“साहब आपने इतने पैसे लगाए हैं मरीजों के लिये तो हम पानी भरने के पैसे लेंगे क्या ? पाइप से पानी भरने में कितना तो समय लगता है कौनसा बाल्टी बाल्टी भरना है | हम भर भरा देंगे और छोटी मोटी मरम्मत मुझे आती है हम देखभाल भी कर देंगे | आप निश्चिंत रहो |”  उसने पवित्र भाव से कहा | 

सेठिया जी और मैं कृत कृत हो गए थे |  आगामी दो महीनों में किसी प्रकार की समस्या नहीं आई और एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि उसने चाय के भी पैसे नहीं लिए |  

               अब इतने साल बाद उन कूलरों की क्या हालत है यह देखने हम कभी नहीं गये | इस पूरे घटना चक्र में हमारे सहयोग में बहुत लोगों की टीम थी | संक्षिप्तीकरण के लिहाज से घटनाओं में उनके योगदान को मैंने पूर्ण एडिट कर दिया अन्यथा  यह एक पुस्तक के रूप में लिखी जा सकती है | 

                   हमारे साथ जो हुआ , वही मैंने लिखा है यह भाव कतई नहीं है कि सभी सरकारी संस्थानों में इसी प्रकार से होता है | कुछ अनुभव ऐसे भी रहे हैं जब मैंने देखा कि कर्मचारी और अधिकारी गण अपने वेतन से जनोपयोगी कार्य करवा रहे हैं | अमूमन दानदाताओं का बड़ा सम्मान होता है | यह अनुभव एक अपवाद स्वरुप ही रहा | 
इति शुभम ..

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