​●सम्मान ● 

                     किशना राम सरकारी विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था | स्वभाव से भोला था तो लोग उसे घुघू राजा भी बुलाते थे |  उसकी सामान्य सी कद काठी और पक्की रंगत थी | चेहरे पर बेतहाशा बढ़ी हुई बड़ी बड़ी मूंछे रखता था |  ढलती उम्र में बाल खिचड़ी से हो चले थे |  पहले जहां पांच छह दिन में एक बार दाढ़ी बनाता था, एक पेंट शर्ट सप्ताह भर पहने रखता था और जूतों में पॉलिश तो ब्याह शादी में ही किया करता था वहीं आज कल वो टनाटन रहने लगा था | साईकिल की जगह नई एक्टिवा खरीद ली थी |  इसका श्रेय जाता था हेमन्त को |  दो महीने पहले ही यह लड़का कलकत्ता से आया था |  वो रोज शाम को मुहल्ले की पान की दुकान पर अपने चेले चांटियों के साथ कैरम बोर्ड खेलता मिल जाया करता जहां किशना राम बीड़ी पीने जाया करता था |  उसके जाते ही वो अदब से खड़ा हो कर चरण स्पर्श करता और उसके लिये किसी को डांट कर कुर्सी खाली करवाता |  पीने के लिए पानी का लोटा भर लाता |  शुरू शुरू में किशनाराम बहुत असहज हो जाया करता था क्योंकि इतने सम्मान की उसे आदत जो नहीं थी ,  पर अब वो काफी सहज हो गया था |  उसे खुद लगने लगा था कि वास्तव में उसे आज तक किसी ने पहचाना ही नहीं था |  हेमन्त उसके पास बैठ कर कभी उसके व्यक्तित्व की प्रशंसा करता तो कभी आवाज की ..|  वो उसे गाने के लिये कहता और किशनाराम अपनी बेसुरी आवाज़ में रफ़ी के गाने सुनाता |  हेमन्त उसकी गायकी की भूरी भूरी तारीफ किया करता |  कोई उसे बेसुरा बताता तो फट से बांहे चढ़ा लेता था इसलिये दूसरे लोगों ने  टिप्पणी करना ही बंद कर दिया था |  

              हेमन्त ने पता नहीं क्यों एक बार कहा था कि आपकी बेटी भी आपकी तरह गुणों की खान है | किशनाराम ने कहा कि उसकी बेटी नहीं बेटा है , इस बात पर वो कितना खुश हुआ था , कहने लगा आज देश को आप जैसे लोगों की ही जरूरत है जो बेटी बेटे में भेद न रखे | किशनाराम के एक बेटा ही था | उसे हेमन्त की बात कुछ समझ नहीं आई जिसके लिये भी  उसने अपने घुघूत्व को ही जिम्मेदार समझा | हेमन्त अक्सर किशनाराम को कहता कि उसे जिंदगी में कोई मिला है तो सिर्फ आप जिससे की वो प्रभावित हुआ है |  वो किशनाराम को उस्ताद जी कह कर सम्बोधित  किया  करता  था |  किशनाराम ने भी उसे शिष्य स्वीकार कर लिया था |  

                     किशनाराम अपनी पत्नी को दिखाना चाहता था कि उसकी कितनी कद्र है , क्योंकि वो भी उसे घुघू राजा ही समझती थी |  पत्नी को दिखाने के लिये उस दिन वो उसे एक्टिवा पर बिठा कर मंदिर दर्शन करवाने ले गया |  लौटते समय जानबूझ कर पान की दुकान के सामने गाड़ी रोकी .. हेमन्त  कई और लड़कों के साथ बैठा कैरम खेल रहा था |  उसने गाड़ी स्टार्ट रखी और उच्च स्वर में हाँक लगाई

 ” हेमन्त ..” 

“क्या है बे  ..?”  उसने कठोर स्वर में जवाब दिया |  किशनाराम को लगा उसने पहचाना नहीं 

“अरे मैं हूँ उस्ताद जी ! एक पानी का लोटा तो ला ..”  वो सप्रयास अपने क्षीण स्वर में कुछ आदेशात्मक भाव लाता बोला 

“तेरे बाप का नौकर हूँ क्या ..?  आइंदा इस तरह बात की तो टांगे तोड़ दूंगा ..”  उधर से बड़ी बेरहम आवाज सुनकर किशनाराम बुरी तरह घबरा गया हड़बड़ा कर गाड़ी आगे बढ़ा दी और गिरता गिरता बचा |  पत्नी मुँह में पल्लू दबा कर हंस रही थी सो अलग |  किशनाराम का दिमाग काम नहीं कर रहा था | दो महीने पहले तक तो उसकी ऐसी कोई सम्मान की महत्वाकांक्षा ही नहीं थी लेकिन अब शायद उसे सम्मान की  लत लग   गई थी |  आज उसे ऐसे महशूस हो रहा था जैसे आसमान से धरती पर आ गिरा हो |  पूरी रात करवटें बदलते बीती | 

               दूसरे दिन जब पान की दुकान पर गया तो देखा हेमन्त पीछे वाली गली के किशनाराम जी को लिये बैठा था | किशनाराम जी कान पर एक हाथ लगा कर पंचम सुर में भजन सुना रहे थे और वो वाह वाह कर   रहा था |  उसके दिमाग की  चूलें   हिल    गई | मन खट्टा हो गया | उस दिन के बाद उसने उस दुकान पर जाना ही छोड़ दिया |  अब वो अपने पुराने ढर्रे पर वापिस आ गया  था| एक्टिवा घर पर ही खड़ी रहती वो साईकिल लेकर ही कार्यालय जाने लगा | कई दिन बीत गए | 

               आज पिछली गली वाले किशनाराम जी उसके घर आए थे | अपनी बेटी शीला की शादी का कार्ड दे गए थे | किशनाराम ने गौर से पढ़ा  कार्ड पर लिखा था “शीला संग हेमन्त ” 

किशनाराम ने सिर पीट लिया उसे सारा माजरा समझ आ गया था , वो इतना भी घुघू नहीं था |

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