​●ग्लानि●

                        धारावी की उस बस्ती में वो एक सामान्य सी दोपहर थी |  सुधा गली में बिखरे गन्दे पानी से बिना नाक सिकोड़े निकल रही थी |  गन्दी नाली में गिरी  गेंद निकालते बच्चों से भी आज उसे घिन नहीं आ रही थी क्योंकि आज उसे स्वयं से ही ज्यादा घृणा हो रही थी |  अपमान और क्रोध से उसका चेहरा तमतमा रहा था |  बाबा कहते थे तन और मन से तो दोस्त रिश्तेदार काम आ भी सकते हैं पर धन से कोई साथ नहीं निभाता इसलिये किसी से कभी भी पैसे मत मांगना  |  आईं ने भी कहा था कि 107 नम्बर वाली मैडम परसों पगार दे देगी पर उसे ही जल्दी मची थी कॉलेज की फीस जमा करवा कर एड्मिसन कार्ड लेने की तभी तो उसने कल अपनी सहेली जानकी की आई दुर्गा चाची को बोला था कि जानकी के साथ उसकी फीस के भी पैसे दे देना परसों वो वापिस कर देगी ..और उसने हाँ भी बोला था  आज वो उसके घर गई थी तो उसकी गली में मुड़ते ही उसने देखा कि दुर्गा चाची और जानकी किसी अपरिचित स्त्री के साथ अपनी खोली में घुस रहे थे .. जानकी की तो साफ साफ उससे आँख भी टकराई थी ..पर कैसे उनके अंदर घुसते ही जानकी के बाबा दौड़ते से बाहर सीधे उसकी तरफ आ गए थे  और कैसे रूखे से बोले थे ” सध्या घरी कोणीही नाही.. च्या नंतर परत येईल” (अभी घर पर कोई नहीं है.. चलो बाद में आना) वो उसे लौटने का इशारा कर रहे थे ..जैसे किसी मांगने वाली मंगती को भगाया जाता है .. वो तुरन्त पलट गई थी .. अपमान की आग उसे भस्म किये जा रही थी … उसे अपने बाबा की बहुत याद आ रही थी .. उन्हीं का सपना था कि वो घरों में काम करने वाली बाई नहीं बनेगी ..पढ़लिख कर बड़े लोगों की तरह रहेगी ..बाबा के गुजरने के बाद आई ने दो घरों का काम और ले लिया पर उसे कभी कॉलेज की फीस और किताबों के लिये पैसों की कमी महसूस नहीं होने दी ..और आज उसने आई की सारी मेहनत पर पानी फेर दिया था ..फकत 750 रुपयों के लिये जलील होकर आई थी ..जानकी उसकी बचपन की सहेली ..कितना गुमान था उसके और अपने बाबा की दोस्ती पर ..दोनो दोस्तों ने तय किया था मेहनत मजदूरी करेंगे और जरूरत पड़ी तो पेट काट कर दोनों लड़कियों को पढ़ाएंगे .. बाबा जब गुजर गए तब लिटु चाचा कैसे मगरमच्छ के आंसू बहा बहा कर कहते थे कि अब से उसकी एक नहीं दो दो बेटियां हैं ..  और आज 750 रुपयों में अपनी जात दिखा दी .. बाबा तुम्हीं सही थे ..पैसे किसी से नहीं मांगने चाहिये ..
“अहो सुधा … तुझ्या घरी मी होते..”  तन्द्रा टूटने से सकपकाई सी उसने डबडबाई आँखों को पोंछकर देखा जमुना ताई आवाज लगा रही थी 

“अरे कहाँ खोई है कितनी आवाज दे रही हूँ .. ” 

“वो ..कुछ सोच रही थी  ताई.”

“तो सुन दुर्गा का फोन आया था अभी ..तेरी आई का फोन बंद आ रहा करके..  बोली कि दोनों माँ बेटी को खबर करने का ..अरे जीतू के लिये उसने तेरी बात चलाई है ..उसकी आई को वो अबीच तुम्हारे घर लायेगी ..वो उसके घर बैठी है .. ”  

” कौन जीतू ..?” 

” अरे जीतू .. राहिल सोनगांवकर का मुलगा..जो इंजीनियर बन कर बड़ी कम्पनी में साब बन गया .. अब तूँ घर जा जल्दी से मैं तेरी आई को बुलाती हूँ तब तक तूँ तैयार हो जा .. दुर्गा कह रही थी कि अभी तूँ उसके घर पहुंच गई थी .. वो तुझे इतने सादे कपड़ों में जीतू की माँ को  दिखाना नहीं चाहती थी इसलिये तुझे बाहर से ही भेज दिया .. वो क्या कहते हैं ..फर्स्ट इम्पीरेसीन धांसू मांगता है ..”  जमुना ताई मुंह पर पल्लू ऱखकर हंसती हुई बोली ..  

“मेरी क्यों बात चलाई ..?  जानकी की क्यों नहीं ..?” उसके चेहरे पर उलझन छा गई थी 

“अरे जीतू की मां ने तो जानकी के लिये ही बोला था पर  जानकी के बाप ने साफ कह दिया कि उसके एक नहीं दो बेटियां है करके .. सुधा तीन महीने बड़ी है तो पहले उसकी बात करूंगा .. देवा ..इस कलयुग में भी ऐसे लोगों से दुनिया चलती है बाबा ..वरना कोई इतना अच्छा रिश्ता पराई लड़की के लिये छोड़ता है क्या ..” कहकर जमुना ताई तेजी से उसकी आई को बुलाने चली गई 

सुधा को अब पहले से ज्यादा स्वयं से और अपने विचारों से नफरत हो रही थी ..उनके बड़प्पन के बोझ से उसकी तनी हुई पीठ झुक सी गई थी …

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