● वैद्यराज बिरजू ●

                        उस दिन  मैं  काफी समय बाद उस क्षेत्र से होकर गुजर रहा था  जहां बिरजू  ने हंसमुख वैद्य जी के पुराने से औषधालय को नवीन रूप दे दिया था |

                            आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण हेतु क्वालिफाइड वैद्य होने की न्यूनतम अर्हता होती है जिसे कि आवश्यक औषधियां क्रय करने और उनका निर्देशित मात्रा में भंडारण करने का लाइसेंस भी प्राप्त होता जाता है जिसमें अफीम जैसे प्रतिबंधित पदार्थ भी शामिल है |  इस बाबत वैद्य हंसमुख जी के प्रमाणपत्रों का उपयोग किया गया | 

                           विशालकाय  रंगारंग नियोन बोर्ड पर बिरजू अपनी  विशाल देह सहित खरल घोंटता हुआ तस्वीर पर मौजूद था | जिस के ऊपर लिखा था “आयुर्वेद का सिंह” |  एक तरफ वैद्य हंसमुख जी अपनी कृशकाय देह सहित दीन हीन से नुमाया हो रहे थे जिसके ऊपर बड़ी होशियारी से लिखा गया था       “अंगेजी दवाएं -बिगाड़े बुढ़ापा ” 

साइड में लम्बी पट्टी सी ऊपर नियोन बोर्ड से नीचे की तरफ लंबाई में आ रही थी  जिस पर लिखा था 

” नशामुक्ति 

रोगी को बताए/बिना बताए अफीम छुड़ाएं

ज्वर , पीलिया , आंत्रशोध ….

गारंटीड ईलाज ” 
                         उस चमक दमक के अलावा वहाँ ग्रामीणों की भीड़भाड़ भी बिरजू की  सफलता की कहानी कह रही थी |  मैं किसी तरह धक्कामुक्की करके अंदर घुसा तो वहां बने रिसेप्सन पर बैठी एक सुंदर बाला ने बताया कि वैद्य कविराज जी अंदर किसी मीटिंग में व्यस्त हैं |  मेरे जोर देने पर उसने इंटरकॉम पर इजाजत लेकर मुझे अंदर भेजा | मैंने देखा कि बाहर रिसेप्सन के बाद खुली जगह पर कुर्सियां करीने से लगी थी जो सब बारी के इंतजार करते मरीजों से भरी हुई थी | दाई तरफ एक दरवाजा था जो बकौल रिसेप्शनिस्ट मीटिंग हॉल था जबकि बाई तरफ के दरवाजे पर लिखा था वैद्य बृजभूषण ‘बृज’ |  यह शायद  मरीज देखने का  कमरा था |  माहौल अत्यन्त भव्य था | 

                          मीटिंग हॉल के अंदर गया तो मैंने देखा कि बिरजू लगभग  दस बारह लड़कों के साथ गम्भीर मीटिंग में व्यस्त था |  उसने आँख के इशारे से मुझे बैठने को कहा | उनकी  बातचीत से पता चला कि वो लड़के मार्केटिंग विंग के थे जो कि गाँवों से पेशेंट लाते थे |  वहाँ बिरजू एक एक के कमीशन का हिसाब भी कर रहा था और कम परफॉर्मेंस वालों को डांट भी रहा था तो आगामी माह के “टारगेट” भी दे रहा था |  

                  सभा समाप्त ही हुई थी कि बाहर शोर बढ़ गया | रिसेप्सन वाली बाला ने आकर बताया कि कोई एमरजेंसी केस आया था जिसे बिरजू ने “चैम्बर” में भेजने का आदेश दिया और वहीं पड़े सफेद कोट को धारण करते हुए स्टेथेस्कोप गले में लटकाया अंत में ड्रॉअर खोल कर सर्जिकल दस्ताने पहने और मुझे ठहरने का कहकर तोंद झुलाता सा तेजी से चैम्बर की ओर बढ़ गया | मैं भी उत्सुकतावश उसके पीछे गया | 

                   मैंने देखा  पांच सात ग्रामीण एक जने के दोनों  हाथ और पाँव पकड़ कर उठाये हुए अंदर चैम्बर में लाए |  अब साइड बेड पर पड़ा रोगी बुरी तरह से छटपटा रहा था और चीख रहा था 

“क्या नाम है तेरा ?”  बिरजू दस्ताने पहने हुए उसकी नाड़ी देखता हुआ आँखें निकाल कर जोर से गरजा 

“होकम म्हारो नांव कालू है ..” मरीज बिरजू के खूंखार व्यक्तित्व और दहला देने वाली गरजदार आवाज से भयभीत हो कर शांत हो गया था | बिरजू ने कुछ देर स्टेथेस्कोप भी उसकी छाती पर रखा लेकिन अपने कानों में लगाना जरूरी नहीं समझा |  

“ह्म्म्म .. कब से अफीम  खा रहा था ” बिरजू गुर्राया

“होश सम्भाल्यो जद उं ई बैद जी ” रोगी मिमियाया

“तो अब क्यों नहीं खाता  ?  पैसे टके की समस्या हो गई  क्या ?”  बिरजू ने टोह ली 

“पिसा री कमी कोनी जमीदार हां ..घरआळी अमल छोडण वास्ता लारे पड़गी तो चार दिनाँ सूं कोनी खायो ..कई करो बैद जी हूँ तो मरूँ ..ऐ मां ऐ ..”  रोगी अजगर की तरह मरोड़े खा रहा था 

“मेरी दवाई अफीम से तीन गुना महंगी है ..ले पाओगे ?”  बिरजू ने रोगी की क्रय क्षमता का अंतिम आकलन किया 

“हाँ बापजी देओ तो सही ..पण अब अफीम नई खाणी  ..” रोगी छटपटाया 

“बृजमुख एक्सप्रेस वटी ” उसने अपने पीछे खड़ी बाला को तुरन्त आदेश जारी किया और जैसे जादू के जोर से एक डिबिया तुरंत उसके हाथ में आ गई |  बिरजू ने बड़ी नफासत से डिबिया खोली और एक चमच दवा रोगी के मुंह में डाल दी जिसे रोगी पानी से गटक गया | 

चमत्कार की तरह कुछ हुआ | लगभग दस मिनट में रोगी शांत चित्त खड़ा बतिया रहा था |  उसने बिरजू से वैसी दस डिबियाएं खरीदी जिसके बदले में एक काफी बड़ी रकम अदा की | जाने से पहले मरीज और साथ आए ग्रामीण बिरजू के पैर  छूना   नहीं भूले | 

 ” क्यों बे गँवारू  | तुझे  अब  फुर्सत   मिली है  क्या ?”  मरीज  से फारिग होकर एकांत में बिरजू मुझसे मुखातिब हुआ |  मैं कुछ देर तक उसके ठाठ बाठ के प्रभाव  में  कुछ बोल नहीं पाया | फिर ख़ुशी की भावुकता में उठ कर उससे लिपट गया | 

” मोटू ..तेरी इस सफलता से मैं बहुत प्रशन्न हूँ, देखा ईमानदारी के काम से पैसा भी आता है और इज्जत भी बढ़ती है ” मेरा गला रुंध गया था | उसने मुझे पानी पिलवाया और अपने सामने कुर्सी पर बिठाया |  

“ईमानदारी वगैरह कुछ नहीं गंवार आदमी …. धंधा है ”  वो ठसक से हँसा 

“मतलब ..?” 

“तूँ भी ठहरा गंवारू ..देख इसे ” वो वही डिबिया मुझे दिखाते हुए बोला “यह है बृजमुख एक्सप्रेस वटी ..अफीम का नशा छुड़ाने की दवा ..इसमें तीस प्रतिशत अफीम है और शेष कुछ सस्ती निर्दोष दवाएं ..इसकी कुल कीमत अफीम से तीन गुनी है ..जब कोई अफीमची इसका सेवन करेगा ..बताये या बिना बताए तो अफीम क्यों मांगेगा भला ? और फिर इसका  एडिक्ट हो जाना लाज़मी है ..” उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी 

“तुम अफीम कैसे इस्तेमाल कर सकते हो यह गैरकानूनी है  ..” मुझे रोष उत्पन्न हो रहा था | 

“लाइसेंस है भाई …कर्पूर रस वटी और अनेक दवाओं के लिये जरूरी है …जिसका निर्माण हम बिना अफीम ही करते हैं और जितना करते हैं उसका पचास गुना “शो” करते हैं ” 

“तुम्हारे बारे में यह भी कीर्ति फ़ैल रही है कि तुम आयुर्वेदिक दवाओं से ज्वर, निमोनिया, पीलिया और टाइफाइड जैसी बीमारियों का भी बहुत बढ़िया और तेज ईलाज कर देते हो ..” मैं अब कुछ अच्छा सुनने को आशान्वित था 

“देख भाई पीलिया लिवर की बीमारी है जो कि सत्तर प्रतिशत तो अपने आप ही ठीक होता है जिसमें मैं दवा के नाम पर मिश्री पाउडर देता हूँ लेकिन खान पान में परहेज करवा देता हूँ ..ज्वर आ रहा है तो बृजमुख वटी नम्बर एक सौ एक जो कि पेरासिटामोल टेबलेट से ही बनती है ..और हाथों हाथ बुखार उतार देती है ..बाकि बैक्टीरियल इन्फ़ेक्सन वाले रोगों के लिये अंगेजी एंटीबायोटिक्स दवाओं के चूर्ण ..”  वो अपने दोनों हाथों से खरल में पीसने जैसी मुद्रा बनाता हुआ मुस्कुराया |    मेरा  जी खट्टा हो  गया था | 

                   कुछ महीने शांति से बीते |  कोई भी अमीर व्यक्ति वास्तव में गरीब लोगों की मेहनत के बल से ही अमीर बनता है लेकिन अमीर होने के बाद वो अमीरों के साथ उठना बैठना पसंद करता है और गरीब आदमी के पसीने से उसे बदबू आने लगती है |  यही बिरजू के साथ हुआ |  उसका व्यवहार अपने शुरुआत के साथी स्टाफ के साथ बिगड़ने लगा और जिसके फलस्वरूप उसकी मार्केटिंग विंग , निर्माणशाला या औषधालय के स्टाफ में से किसी ने उसका सारा कच्चा चिट्ठा प्रमाणों सहित अख़बारों में भेज दिया |  मिडिया के प्रेशर में प्रशासन और पुलिस हरकत में आ गई | कुल नतीजा यह रहा कि वैद्य हंसमुख जी निर्दोष होते हुए भी बिरजू के साथ धर लिये गये क्योंकि सारे कारोबार में उनकी ही डिग्रियों का इस्तेमाल हुआ था और सारे लाइसेंस और परमिशन उनके नाम से ही जारी हुए थे |  बाद में बड़ी मुश्किल से वैद्य राज जी का वकील प्रमाणित कर पाया कि सब किया धरा बृजभूषण का था |  अंततः  बिरजू के दोनों  गुब्बारे  इस बार फिर फोड़े गये |   सत्य का सूरज कुछ समय के लिये धुंधला हो सकता है लेकिन सदा के लिये बुझ नहीं   सकता ..
Avinash Vyas

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