● छुटभैया नेता बिरजू ●

हाड़ मांस के उस छः फीट के विशाल काले पहाड़ का नाम बृजभूषण था , बृजभूषण ‘बृज’ पूरा नाम |   यह मैंने जिद करके  पुछल्ला चेंज करवाया था वरना एक बार जब वो नया नया कवि हुआ था तो उसने बृज भूषण ‘भूषण’  ही नाम धर लिया था |  उसे पुकारने वाले कोई पाठकवृन्द तो थे नहीं अपितु उसने दूध वाले ठेले वाले, मिस्त्री, चाय वाले आदि आदि सब को हड़का दिया था कि उसे पुरे नाम से ही पुकारे | उच्चारण में कमजोर अनपढ़ लोग बाग आम शिकायत करते पाए गए कि यह भूषण का लगातार दो बार जाप कई बार अलग ही  प्रतिध्वनि पैदा कर देता है इसलिये कइयों ने मूसल कहना शुरू कर दिया था  |  मेरे बचपन का मित्र है सो पीड़ा होना स्वाभाविक था और मैंने उसे पुछल्ले की जिद छोड़ने का बोला  तो उसने मुझे गंवार घोषित करते हुए कवि जीवन में पुछल्लों की महिमा से रूबरू करवाया |   खैर अंततः वह “बृज” पर मान गया था |  यह बात और है कि पीठ पीछे  उसे लोगबाग  हावड़ा ब्रिज  ही कहा करते हैं | 

                  बृज अपने जीवन काल में कई धंधे कर चुका है और आगे भी कई और करने का अभिलाषी है |  उसका कहना है कि वो एक जीवन में कई जीवन जीना चाहता है जैसे एक टिकट में अनेक सिनेमा |  यह बात और है कि बरसों पहले उसकी जब सगाई हुई थी तब शादी की तारीख आते आते उसने तीन धंधे बदल लिए जिसका बदला दुल्हन के बाप ने दूल्हा बदल कर चुका दिया था |  चिरकुंआरा बृज तब से आज तक अपने विधुर पिता किशोरीलाल जी की पेंशनयाफ्ता जिंदगी का इकलौता  गम बने हुए था |  

                       अभी कुछ दिन पहले की बात है मैं दोपहर में खाना खा कर पान की दुकान को जा रहा था कि किसी मकान की छत से उसकी धीर गम्भीर आवाज मेरे कानों में पड़ी –

” कहाँ जा रहा है गंवार आदमी ..?”  मैंने गर्दन उठा कर देखा वो डॉक्टर पी पी शर्मा जी की मकान की बॉलकोनी में बड़े ठाठ से खड़ा था | 

 ” पान खाने ..” मैंने अचकचा कर जवाब दिया |  मुझे ताज्जुब था कि डॉक्टर पुरे मुहल्ले में किसी को मुंह नहीं लगाता वो और उसकी बीवी कैसे उसकी सेवा में उसके पास ही बड़ी निर्मल सी मुस्कान सहित खड़े हैं | 

“दिहाड़ी पर नहीं गया ..?”  अगला प्रश्न 

“आज शनिवार की छुट्टी है ..फाइव डे वीक ..” मैं तिलमिलाया सा दांत भींच कर बोला 

“चल ऊपर आ जा ..बढ़िया चाय पिलाता हूँ ..” उसके स्वर में आदेशात्मक पुट था |  उसके बाद डॉक्टर साहब खुद नीचे आकर मुझे अंदर ले गए |  चाय नाश्ते के साथ मुझे समझ आया कि बिरजू आजकल  नेतागिरी में आया हुआ था और डॉक्टर साहब का स्थानांतरण कहीं बाहर हो गया था जिसे कैंसिल करवाने का ठेका उसने ले रखा था |  इस काम के लिये उसने पूरे दो लाख में सौदा किया हुआ था |  मैं अवाक् था |  

              बातचीत से मुझे पता चला कि उसने डॉक्टर को कह रखा था कि लोकल एमएलए की उससे बनती नहीं है क्योंकि मंत्री  उसको यानि बृज को ज्यादा तवज्जो देता है इसलिये वो उसके पास नहीं जायेगा लेकिन दस्तूर है कि एमएलए की डिजायर जरूरी है , सो आप ही को करवानी पड़ेगी  जो  कि  बकौल  उसके “मामूली”  काम था  |  

               हमें अंदर विशाल दिवान पर बिठाया गया था जहाँ बृज अधिकारपूर्वक पसर गया और सामने मिठाइयों और नमकीन की भरी प्लेटें सजाई गई थी | 

“यह एमएलए साहब ने क्या कहा ?”  वो अत्यन्त गंभीर स्वर में गाव तकिये पर टेक लगाये मुँह में बर्फी का टुकड़ा झौंकता हुआ डॉक्टर से मुखातिब था |  

“जी उन्होंने कहा है कि डिजायर कर दी है ..आप निश्चित रहिये ..लेकिन आप भी जानते हैं खाली डिजायर से भला कुछ होता है ..”  डॉक्टर अत्यंत कोमल स्वर में बोला |  

“तो बस अब आप निश्चिन्त रहो… आज ही राजधानी निकलूंगा और आप का काम यूँ चुटकी बजाते हो जायेगा ..” उसने सप्रयास चुटकी बजाने का असफल प्रयास किया   “..आपको बीस हजार मुझे अभी देने होंगे ..कार का भाड़ा है , होटल का बिल ..आप समझते ही हैं ..”  

“अरे वो तो अपनी बात हो ही रखी है ..लीजिए ..”  डॉक्टर ने एक कान से दूसरे कान तक मुस्कान खींचते हुए नोट उसकी खुली हथेली पर रख दिए | 

                      मैं डॉक्टर की बेवकूफी पर हैरान था |  मुझे एक पुरानी कहावत याद आ रही थी कि ‘या ठगाए रोगी या ठगाए भोगी’  |  सरकारी कर्मचारियों का स्थानांतरण रोग है या उसका निरस्त होना भोग यह मैं तय नहीं कर पाया |  बहरहाल वहाँ से प्राप्त धनराशि सहित हम बिरजू के घर पहुंचे |  पूरे रास्ते में हम उसकी खद्दर वाली पौशाक की गरिमा में खामोश रहे  | 

                    घर पहुंचने पर उसने मेरी उत्कंठा भांपते हुए बताया कि विभाग का मंत्री अत्यंत सैद्धान्तिक और ईमानदार आदमी है और लोकल एमएलए की डिजायर से डॉक्टर का स्थानांतरण सौ प्रतिशत हो जाने वाला था |  वो हफ्ता दस दिन गाँव जाकर रहेगा और डॉक्टर की गुड़ न्यूज मोबाईल पर आते ही शेष धनराशि वसूल लेगा |  

“मगर स्थानांतरण किसी कारणवश  नहीं हुआ तो ..?”  मैं उसके किसी बुरे अंजाम से भयभीत होकर बोला 

“तो मेरा जवाब होगा कि एमएलए साहब ने झूठ बोला था .. डिजायर ही नहीं आई थी तो उसका ट्रांसफर कैंसिल कैसे होता .. और डॉक्टर की इतनी औकात नहीं कि वो एमएलए को झूठा ठहराने उसके पास पहुंचे ..”  उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी |

आगे यह रहा कि 

  डॉक्टर का स्थानांतरण नहीं हुआ था और डॉक्टर की शिकायत पर बृजभूषण के दोनों आ’भूषण’ सूजा दिए गए थे |  आजकल सुना है पुनः कवि हो गया है |

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