● प्रश्न ●

“मंगल से तुम्हारा क्या रिश्ता था दीपा..?” रात के उस समय बेडरूम में खिड़की के पास खड़े सिगरेट पीते शेखर सिन्हा ने काफी समय विचार करने के बाद आखिऱ पूछ ही लिया |उसके चेहरे पर गहरी अप्रशन्नता के भाव थे |  वार्डरोब को व्यवस्थित करती दीपा इस प्रश्न से जैसे अवाक् रह गई |  

“जवाब तुम्हे देना पड़ेगा दीपा ..” दीपा के मौन से शेखर का शक गहरा गया था  “.. तुम्हारी और मंगल की तस्वीरें मैने खुद उसके घर से बरामद की है..” 
“तो ?” दीपा निर्विकार उसकी आँखों में देख कर बोली

 

“पूछोगी नहीं कौन मंगल ?” 
“मंगल  ..मैं जानती हूँ तो पूछना क्या ..?” 
“मतलब तुम उससे अपने रिश्ते कबूल करती हो ..?” 

शेखर गहरे क्षोभ और विस्मय से उसे देख रहा था 
“कैसे रिश्ते ..?” दीपा आँखों में आँखे डाले खड़ी थी 
“व.. वो तुम बेहतर जानती हो ..सीधे सवाल का सीधा जवाब दो .. ” शेखर सिटपिटा सा गया |  
“तुम्हारा सवाल में दो गलतियां है  इंस्पेक्टर शेखर सिन्हा .. तुम्हारा प्रश्न है कि मेरा मंगल से क्या रिश्ता था ..सवाल का काल गलत है क्योंकि भूतकाल तब होता जब या तो मंगल मर गया होता या मैं नहीं रहती ..तो जो भी था वो आज भी है और अन्य बातें समान रही तो आगे भी रहेगा ..” 
“..और दूसरी क्या गलती है ..?” शेखर के जबड़े भींच गये थे | 
“दूसरी गलती है रिश्ता ..रिश्ता राशन कार्ड में दर्ज हो जाता है ..उसका राशन कार्ड भी तुमने बरामद किया होगा ..देखना उसमें मेरा नाम नहीं मिलेगा ” 
“दिस इज टू मच दीपा ..” शेखर जैसे आगबबूला हो गया था 
“वाट टू मच .. ” दीपा की आवाज बुलंद थी “तुम मेरे चरित्र पर प्रश्न उठा रहे हो ..तुम एक नक्सली के ठिकाने से बरामद फोटो के बारे में यह नहीं पूछ रहे कि यह तस्वीर मैंने कब और क्यूँ खिंचवाई ..यह भी नहीं पूछा कि मैं उसको कैसे जानती हूँ ..यह भी नहीं पूछा कि क्या मुझे पता था कि नहीं कि वो एक नक्सली था ..तुम ने खुद ही इमेजिन कर लिया कि वो तुम्हारी बीवी का पुराना यार था ..और अपनी इस घटिया सोच से इतने आश्वस्त हो कि तुम्हे सिर्फ मेरे कबूलनामे की ही औपचारिक जरूरत रह गई ..” दीपा उसकी आँखों में आँखे डाले कह रही थी “..और मैं ऐसे किसी कबूलनामे से साफ इन्कार करती हूँ ..” 
“आई एम् सोरी दीपा ..प्लीज बताओ कि तुम उसे कैसे जानती हो ..” शेखर शर्मिंदा था |  दीपा के चेहरे का तनाव कुछ कम हुआ | 

“प्लीज ..मैं बहुत तनाव में हूँ दीपा ” 
“मेरे बड़े भाई गोवर्धन का बचपन का दोस्त है मंगल  ..वो अपने माता पिता के साथ हमारे पड़ौस में ही रहता था और उसके कोई भाई बहन नहीं थे इसलिये हम तीनों भाई बहनों जैसे ही बड़े हुए .आगे चलकर मंगल ने यूनिवर्सिटी में कई छात्र आंदोलनों में बढ़चढ़ कर भाग लिया फिर सुना कि वो बागी हो गया था ..नक्सली मूवमेंट से उसके जुड़े होने की खबरें आने लगी ..लेकिन गोवर्धन भैया को उसका रास्ता पसंद नहीं था इसलिये धीरे धीरे सम्पर्क समाप्त हो गया ..”  
“फिर तो वो तुम्हारी बात जरूर मानेगा दीपा …वो हमारी हिरासत में है …उसे समझाओ कि वो हमें अपने साथियों और उनके ठिकानों की जानकारी दे ..तुम जानती हो वो बर्बादी की कगार पर है ..आज नहीं तो कल फांसी पर लटकेगा या पुलिस की गोली का शिकार होगा ..उसे कहो कि वो मुख्यधारा में लौटे ..मैं गारंटी लेता हूँ उसे सरकारी गवाह बना लिया जायेगा ..” 
“शेखर.. फर्ज करो के मेरी मंगल के साथ तस्वीर की बाबत मैंने तुम्हे जो बताया वो न बताती और कहती कि मैं बताना जरूरी नहीं समझती …तो तुम क्या करते ..?  अंतिम परिणति के रूप में क्या तुम तलाक तक कि नहीं सोच चुके होते ..? ” 
“….” 
“क्या तुम नहीं जानते कि तलाक वैवाहिक जीवन का श्राप है ? क्या फिर भी तुम इससे गुरेज करते ?” 
“….” 
“नहीं करते और इसमें तुम्हारा दोष भी नहीं क्योंकि तुम एक पुरुष हो और अपनी पत्नी के साथ अविश्वास भरे माहौल में नहीं रह सकते थे . जानते हो क्यों ?  क्योंकि  गृहस्थी विश्वास की एक नाजुक डोर से बंधी है और जिसके टूट जाने पर एक साथ गुजारा सम्भव नहीं .. मंगल और उसके साथियों के साथ यही हुआ है ..उनके और व्यवस्था के बीच की विश्वास की डोर टूट गई है जो मेरे जोड़े नहीं जुड़ने वाली ..बीच समुन्द्र में अगर नाव में छेद हो जाए तो दो काम करने पड़ते हैं पहला यह कि नाव को डूबने से बचाने के लिये अंदर आता पानी  बाल्टी भर भर कर बाहर निकाला जाए और दूसरा छेद की मरम्मत का काम ..दोनों ही जरूरी है पर हम बरसों से बस बाल्टी भर भर कर बाहर उड़ेल रहे हैं  |  इस  छेद की मरम्मत के लिये प्रश्नों के जवाब देने होंगे,  चाहे ये प्रश्न  कितने ही गैरवाजिब तरीके से किये जाये  ..लेकिन जवाब जरूर देने होंगे और ये जवाब तो उनको ही देने पड़ेंगे जिन पर ये सवाल किए गए हैं ..और वो तुम नहीं ..मैं भी नहीं ” दीपा ने पटाक्षेप करते हुए कहा |  
         शेखर विचार मुद्रा में खड़ा था | अब सैकड़ों प्रश्न उसके दिमाग में सियारों की तरह हुँआ हुँआ कर रहे थे और जिनके जवाब में उन्हीं सवालों की प्रतिध्वनि मात्र उपस्थित थी जो सवालों का जवाब सवालों से दे रही थी  ..यह शोर था ..शोर को शोर से दबाने की नामुमकिन कोशिश .. नाकामयाब कोशिश  |

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